भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी १५३


'अहं ब्रह्मास्मि' ज्ञान का उदयपूर्वोक्त अनुभव प्राप्त योगी को महा वाक्यों के ज्ञान का उदय होता है, इसलिये अगले श्लोक में 'भवानि त्वं' पद से ज्ञान की भूमिका का उल्लेख किया गया है।

[ २२ ]

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥

कठिन शब्दः— भवानि=हे भवानि; और मैं हो जाऊं। नीराजित पदां=जिस पद की आरती उतारी जाती है।

अर्थः— 'हे भवानि ! तू मुझ इस दास पर भी अपनी करुणामयी दृष्टि डाल', इस प्रकार कोई मुमुक्षु स्तुति करते समय भवानि त्वं' (मैं तू हो जाऊं) इस पद का ही उच्चारण कर पाता है, उस ही समय तू उसे निज सायुज्य पद प्रदान कर देती है, जिस पद की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र भी अपने मुकुटों के प्रकाश से आरती उतारा करते हैं। अर्थात् (प्रणाम करते रहते हैं)।

सं० टि०ः— भाष्यकार डिंडिम का मत है कि वाह्याभ्यन्तर यागों का वर्णन करके शंकर भगवत्पाद इस श्लोक में प्रेमरूपा भक्ति