सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १६३
**कठिन शब्दः—**सपर्या=पूजा, जल्प=बकवास।
**अर्थः—**बोलना मंत्रों के जप सदृश, कर्म काण्ड सब मुद्राओं की विरचना के सदृश, चलना फिरना प्रदक्षिणा के सदृश, खाना पीना आहुति के समान, सोना प्रणाम सदृश, सब सुखों के उपभोग में आत्मसमर्पण की दृष्टि, अर्थात जो भी मेरा विलास है सब तेरी पूजा पद्धति का क्रम हो।
**सं० टि०ः—**यहां ज्ञान योग का लक्षण दिखाया गया है।
स्फोटात्मक शब्दों के सार्थक एवं निरर्थक क्रम को जल्प कहते हैं, यहां तक कि वर्णमाला के अक्षरों के उच्चारण को एकाक्षरी मंत्र कहा जाता है, इसी प्रकार उनके योग से जो पद बनते हैं सब मंत्रों के तुल्य हैं, और इस न्याय से सब जल्प जप के समान है। पूजन में हाथों के अभिनयों से अनेक प्रकार की मुद्राएं दिखाई जाती हैं अर्थात् मुद्राएं एक प्रकार से हाथों की क्रियाएं मात्र हैं इसलिये विविध कर्मों के करने के लिये जो भी क्रियायें हाथ करते हैं, वे सब मुद्राओं के समान हैं। भगवती की व्यापकता सर्वत्र है, इसलिये चलते फिरते समय सर्वत्र उस विभु की प्रदक्षिणा होती रहती है। जठराग्नि भी शक्ति का ही रूप है, वह अन्तराग्नि अन्न पचा कर आत्मा को बलि पहुंचाती है। हवन की अग्नि का कार्य भी हव्य को देवता तक पहुंचाना है, इसी अभिप्राय से उसकी एक कला का नाम हव्यवाहिनी है। खाना पीना इस दृष्टि से सब आहुति देना है।