सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १६५
कठिन शब्द:— दिविषद=देवता; ष्वेल, ष्वेड=विष; कबल=ग्रास, ताटंक=कर्ण फूल ।
अर्थ:— ब्रह्मा और शतमख अर्थात् इन्द्रादि देवगण जरामृत्यु का हरण करने वाली सुधा को भी पीकर, इस विश्व में काल के शिकार होते हैं और कराल हलाहल विष का ग्रास करने वाले शंभु पर काल की कलना नहीं चलती, इसका कारण हे जननि ! तेरे कर्णफूलों की महिमा है ।
सं० टि०— ताटंकों के कहने से भगवती के कानों में पहिने जाने वाले आभूषणों से इंगित भगवती के अखण्ड सौभाग्य का अभिप्राय है । विधवा स्त्रियां उनको उतार देती हैं । शंकर पर हला-हल विष का असर नहीं हुआ, इसका कारण भगवती का अनादि अनन्त अखंड सुहाग है । यह है भगवती के सत्वि का महात्म्य । वह नित्य है, उसका सुहाग भी नित्य है, इसलिये शंकर हलाहल को पीकर भी अमर हैं । देवता अमृत पीकर भी मर जाते हैं । ताटंक अर्थात् कर्णफूल सुहाग के चिन्ह माने जाते हैं ।
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किरीटं वैरिञ्च्यं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयात्तस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥