भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 415 में से

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१८० | सौंदर्य लहरी

पंचदशी और उसके आधार पर अन्य विद्याएं

श्री विद्या का मंत्र १५ अक्षरों का होने के कारण उसे पंचदशी भी कहते हैं, उसमें एक १६ वां बीज लगा देने से वह ही षोडशी विद्या बन जाती है । प्रथम ५ अक्षरों को वाग्भवकूट, बीच के ६ अक्षरों को कामकला कूट और अन्तिम ४ अक्षरों को शक्ति कूट कहते हैं । कादि विद्या मूल विद्या है, उसके आधार पर अगस्त्य मुनि की पत्नि लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु, अगस्त्य, सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र और कामदेव सबने अपने २ इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न २ विद्याओं का रूप दिया, और वे विद्याएं उस २ देवता या ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हैं । कामदेव ने मूलकादि विद्या की ही उपासना की थी । इन विद्याओं को त्रैलोक्य मोहन कवच से जाना जा सकता है ।

चिन्तामणि गुणनिवद्धांक्षवलयाः— सकाम प्रयोगों की शीघ्र सिद्धि के लिये, माला का भी जिस पर जप किया जाता है संस्कार करना आवश्यक है ।

माला का विधान

माला की संस्कार विधि अक्षमालोपनिषद् में दी हुई है । तद्नुसार मेरु अर्थात् शिखामणि पर अनुस्वार सहित क्षकार और दोनों ओर के पचास २ मणियों पर अकार से ळकार पर्यंत सानुनासिक एकाक्षरी मंत्रों की प्रतिष्ठा करनी पडती है । इस प्रकार वर्णमाला के ५१ वर्ण रूपी चिन्तामणियों की गुणनिवद्धा अर्थात् सत्व, रजोगुण और तमोगुण रूपी डोरों के प्रतीक विवर में सुवर्ण, दक्षिण ओर चान्दी, और बाम ओर ताम्र के तारों में गूंथी हुई माला लेनी चाहिये ।

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