सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २२७
पक्षाघात के रोगी हो जाते हैं, और प्रतिष्ठा भी नहीं रहती। अर्थात् श्रद्धा की कमी होते ही उससे योग, सत्य और ऋत तीनों विदा होने लगते हैं और महत् का सहारा छूट जाता है। महत् से आनंदमय सगुण ब्रह्म का ही यहां अभिप्राय है, क्योंकि साधक की प्रतिष्ठा उसी के आधार पर होती है, न कि लोक प्रतिष्ठा पर। विज्ञानमय कोष का आधार आनन्दमय आत्मा ही है, उसे स्वयं परमात्मा का प्रतीक समझना चाहिये।
जब विज्ञानात्मा ही न रहा, तो मनोमय, प्राणमय और अन्नमय आत्मा की क्या दशा होगी यह पाठकगण स्वयं समझ सकते हैं।
मणिपूर चक्र
(४०)
तडित्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥
शब्दः कमपि=जलको भी, हर=अग्नि ।
**अर्थः—**तेरे मणिपूर की शरण में गये हुए श्याम मेघों के रूप धारण करने वाले कं जल की भी सेवा करता हूं, जिन में अंधकार की परिपंथिनी अर्थात् प्रतिद्वंद्विनी बिजली की चमक आभरणों में जटित नाना रत्नों की चमक सदृश इन्द्रधनुष का