सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी २४७
सदा चढ़ाये रखती हैं और वह धनुष् उसकी त्योरी चढ़ी हुई भौंहें ही हैं। कामदेव के धनुष् की प्रत्यंचा भौंरों की कही जाती है, इसलिये भौंरो की उपमा रखने वाले दोनों नेत्र धनुष् की प्रत्यंचा समझनी चाहिये, अर्थात् भगवती की त्योरी चढ़ते ही संसार के सब भय भाग जाते हैं और भृकुटी का मध्यभाग मानो धनुष् को चढ़ाते समय बांये हाथ की मुट्ठी में दबा हुआसा है।
संसार का सबसे बड़ा शत्रु काम है इसलिये उसका धनुष मानो भगवती ने स्वयं छीन लिया है।
कामएष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
(गीता ३, ३७)
काम से क्रोध उत्पन्न होता है, कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता-२, ६२) इसलिये क्रोध भी काम का ही रूपान्तर है जो रजोगुण से उत्पन्न होता है, भगवान कहते हैं कि यह बड़ा पेटू है, बहुत भोजन करने वाला है अर्थात् कभी तृप्त नहीं होता और बड़ा पापी है। अर्थात् सब पापों का घर है। इसलिये इसे यहां संसार का बैरी समझना चाहिये।
उपरोक्त श्लोक का भाव है कि भगवती की त्योरी का ध्यान करने से कामवासना शांत हो जाती है और सब भय दूर हो जाते हैं