भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

२५४ | सौंदर्य लहरी


चरित्रों पर विस्मय प्रकट करने वाली, शिवजी के सर्पों से भीत, कमलों की शोभा को पराजित करने वाली, सखियों के प्रति मुस्कान लिए हुए है, और हे जननि मेरे ऊपर तेरी करुणायुक्त दयादृष्टि है ।

यहां यह बताया गया है कि भगवती की दृष्टि से ९ रसों का भाव टपकता है। जिनके क्रमशः नाम इस प्रकार हैं। श्रृंगार, विभत्स (घृणा), रौद्र, अद्भुत (विस्मय), भयानक, वीर, हास्य, करुणा, और शान्त। इस श्लोक में अन्तिम शान्त रस का नाम नहीं आया है। इसका अभिप्राय यह है कि भगवती की स्वाभाविक दृष्टि शान्त रस पूर्ण है, जो शान्ति कला का स्वभाव है, इसलिये स्पष्ट कहने की आवश्यकता नही है। अर्थात् भगवती की दृष्टि नवधारस पूर्ण है। इस श्लोक का संबंध ४९ वें श्लोक से है। परन्तु दोनों के भाव में भिन्नता है।

[ ५२ ]

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तूश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:— फल=फल और बाण का अग्र भाग; गोत्र=पर्वत, गरुत=पर, पंख.