सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २८३
नाभि में जब गोता लगाया, उसमे लता सदृश उठने वाले धूवें की जो रेखा बनी, उसे जन साधारण, हे जननि ! तेरी नाभी के ऊपर उठने वाली रोमावलि समझते हैं ।
इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि कामोद्दीपन होने पर भ्रूमध्य में शंकर का ध्यान करने से जहां उनका ज्ञानरूपी तीसरा नेत्र है. हृदय में उदय होने वाला काम का ताप नाभि चक्र में उतर कर शान्त हो जाता है और अग्नि के पानी में बुझने से जो धुआं सा ऊपर उठता है, तद्वत् नाभि से हृदय में उठने वाली रोमांच की लता सी उठकर शांति प्रदान करती है ।
( ७७ )
यदेतत्कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशेमध्ये किञ्चिज्जननि तव तद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनुभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥
कठिन शब्दः— कालिन्दी=यमुना, कुहरिणी=कुं हरतीति कुहर, कुहं राति ददातीति वा, बिल, रंध्र, सर्पिणी ।
अर्थः— हे शिवे, हे जननि ! यह जो यमुना की बहुत पतली तरंग के सदृश आकृति वाली ( रोमावलि ) तेरे कृश कटि भाग में किंचित दिख रही है, वह सद्बुद्धि वाले मनुष्यों को ऐसी जान पड़ती है, मानो तेरे कुच कलशों के बीच एक