सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी | २२१
इसलिये—
( ८४ )
श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मात: शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥
कठिन शब्द— पाथ=जल, तटिनी=नदी, चूड़ा=केश, शेखर=चोटी, रुचि=कान्ति ।
अर्थ— हे मां ! तेरे चरण जो श्रुतियों की मूर्धा पर शिखरवत् रखे हैं, दया करके उनको मेरे शिर भी रख दे, जिनका चरणोदक शंकर की जटाजूट से निकली हुई गंगा है, और जिनके तलवों में लगी लाक्षा की कान्ति हरि के चूड़ा में (केशों में) धारण की हुई अरुण मणि की कान्ति के सदृश है ।
( ८५ )
नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो—
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥
कठिन शब्द— अलक्तक=लाक्षा, कङ्केलि=अशोक, असूयति=ईर्ष्या करते हैं ।