सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६८ | सौंदर्य लहरी |
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हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।
अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ? कदापि नहीं दी जा सकती ।
( ८८ )
पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्वाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥
**अर्थ—**हे देवि ! तेरा पद कीर्त्तियों का प्रपद (स्थान) है और विपदाओं का अपद है । न जाने सत्पुरुषों ने उसकी तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार (अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ) दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था ।
विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि ! तू धर्म पालनार्थ अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है ।