भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

सौंदर्य लहरी ३०५


कुचों का उठाव भारी है ) पाठान्तर को ग्रहण करने मे शरीर के स्थान पर चित्त और नितंब के स्थान पर कुचों का दुबारा वर्णन हो जाता है । चित्त को स्फटिक मे उपमित तो किया जा सकता, परन्तु देह की शोभा का वर्णन किया जाना अधिक उपयुक्त दिखता है, और कुचों को दोबारा न बताकर नितंबों का भी वर्णन आना अत्यावश्यक है, इसलिये हमने पाठान्तरों को पृथक् दिखा दिया है ।

शंभु की करुणा और अरुणा दोनों एक ही हैं । अरुणा भगवती का एक नाम है और उसके अरुण वर्ण के कारण प्रसिद्ध है । करुणा भी ककार पूर्वक अरुणा ही है, इसलिये ककार से काचित् का भाव व्यक्त होता है । काचित् का अर्थ 'कोई' होने से करुणा को अरुणा का एक अंश समझना चाहिये । अर्थात् पराशक्ति अरुणा जिसको कोई नहीं जान सकता वह शंभु की करुणा के रूप में ही जानी जा सकती है । दूसरा भाव यह भी है कि शंभु के स्फटिक अथवा कांच सदृश स्वच्छ शरीर में प्रतिफलित होने वाली अरुणिमा ही भगवती अरुणा की छबी करुणा के स्वरूप में दिख रही है । कुटिलता, हिंसा, और कठोरता करुणा के विरोधी भाव होते हैं । दया का मन्द पड़ना भी एक कमी का लक्षण है, और किसी भाव का तनु होना उसके क्षीण होने का पूर्व रूप है । इसलिये शंभु की करुणा में कुटिलता हिंसा, कठोरता, मन्दपना और तनु का भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि शंभु की करुणा के रूप में जगत की रक्षा के लिये ही अरुणा ने यह रूप धारण किया है । अराल का अर्थ कुटिल होता है परन्तु कुटिलता भगवती के केशों की