भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 415 में से

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पृष्ठ 358

३०८ सौंदर्य लहरी

अर्थः—अंबर मणि अर्थात् सूर्य तेरे चरणों के समीप होने पर मुकुर (दर्पण) का काम दे रहा है। तेरे मुख के भय से उसने अपनी किरणों के समूह को अन्दर छुपा लिया है, इसलिये वह स्वच्छ है और तेरे मुख का प्रतिबिंब उसके हृदय कमल के सदृश सदा विकसित है (क्योंकि तेरा मुख कमल सदा विकसित रहता है और वह उसका प्रतिबिंब है), और उसको चन्द्रमा का भय नहीं है। (कमल सूर्य को देख कर खिलता है और रात्रि में मुरझा जाता है मानों उसे चन्द्रमा से भय लगता है)।

यहां पर सूर्य को दर्पण से उपमा देकर, उसमें प्रतिबिंबित भगवती के मुख कमल को उसके विकसित हृदय कमल से उपमित किया गया है। अनाहत् चक्र का स्थान हृदय है, और वह सूर्य-मंडल का स्थान है। अनाहत् चक्र की १२ पंखडियां १२ आदित्य मानी जाती हैं। इसलिये हृदयस्थ सूर्य मंडल भगवती के चरणों के समीप मुकुरवत् रखा हुआ है। ९२ श्लोक में भगवती को जिस मंच पर बिठाया गया है, वह विशुद्ध चक्र है और हृदय चक्र उसके नीचे है और आज्ञा चक्रस्थ चंद्रमंडल ऊपर है। दर्पण स्वच्छ होना चाहिये, यदि सूर्य की किरणें उसको ढकलेती हैं तो वे मुकुर को मलीनवत् करके मुख के प्रतिबिंबित होने में बाधक होती हैं। परन्तु भगवती के मुख का तेज सूर्य के तेज से भी अधिक है अथवा उसका तेज भगवती के तेज से ही प्रकाश पाता है, इसलिये सूर्य ने भगवती के मुख के भय से अपनी किरणों को अन्तःस्तिमित् कर