भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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३१६ | सौंदर्य लहरी

यहां 'अयं विद्यार्थी' पद से अनुमान होता है, कि जिस समय यह स्तोत्र लिखा गया था, उस समय शंकर भगवत्पाद् विद्यार्थी ही थे । वैसे तो मनुष्य जीवन भर विद्या का प्रार्थी रहता है परन्तु विद्यार्थी शब्द रूढी अर्थ में गुरु कुल में रहने वाले विद्यार्थी के लिये ही प्रयुक्त होता है ।

(१०१)

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधि हरि सपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरञ्जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥

**अर्थ—**तेरा भजन करने वाला मनुष्य सरस्वती और लक्ष्मी दोनों से युक्त होकर ब्रह्मा और हरि के सापत्नडाह का पात्र बनकर विहार करता है । और सुन्दर रम्य शरीर से रति (कामदेव की स्त्री) के भी पातिव्रत धर्म को शिथिल करता है, अर्थात् वह विद्वान्, धनाढ्य और सुन्दर रूपलावण्य युक्त शरीर वाला हो जाता है । और पशु पाश के दुःखों को नष्ट करके चिरकाल तक परमानन्द के रस का रसास्वाद लेता हुआ जीवित रहता है ।

बंधन में पडा हुआ जीव पशु कहलाता है, और राग रूपी पाश संसार रूपी खूंटे से बांधने की रस्सी है । कहीं २ आठ पाशों