भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 415 में से

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पृष्ठ 369

सौंदर्य लहरी ३१९


उपसंहार

शास्त्रों में कर्म, भक्ति, ध्यान और ज्ञान भेद से अध्यात्मसाधन के सोपानक्रम के तीन स्तर कहे गये हैं, इनकी साधन पद्धतियों में भिन्नता अवश्य है, परन्तु सब के आधार में एक ही मूल सिद्धान्त है, इसलिये परस्पर में एक दूसरे के विरोधी न होते हुए वे अधिकारी भेदसे सबको उत्तरोत्तर एकही लक्ष्य पर पहुंचाते हैं। श्रीकृष्ण भगवान् ने सब साधनों की उपयोगिता बताते हुए सब जिज्ञासुओं को तीन प्रकार का अधिकारी माना है। प्रथम श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको धनदारादि में दृढ आसक्ति है, वे कर्मयोग के अधिकारी होते हैं, दूसरी श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको संसार से तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया है वे ध्यान ज्ञान के अधिकारी होते हैं, तीसरे मध्यम श्रेणि के मनुष्य वे हैं जिनका चित्त संसार की आपत्तियों से व्याकुल रहता है परन्तु घर की आसक्ति का त्याग नहीं कर सकते, उनको भक्ति योग का अधिकारी समझना चाहिये, उनके लिये भक्ति उपासना का मार्ग ही श्रेयस्कर होता है। यद्यपि सब साधनों का लक्ष्य शुद्धचेतन स्वरूप परमात्मतत्त्व की प्राप्ति की ही ओर होता है, तो भी ऐहिक और पारलौकिक भोगों की प्रबल वासना उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अग्रसर होने में बाधा डालती रहती है। ज्यों २ अनेक दृष्ट और आनुश्रविक अर्थात् देखे और सुने विषयों की तृष्णा कम होती जाती है, चित्त की स्वस्थता उन्नत होती जाती है और वृत्तियां बाह्य विषयों का आश्रय त्याग कर अभ्यन्तर नित्य अखंड आनन्दमयी आत्मज्योति का अवलंबन पकडने लगती हैं। बाह्य विषयों से शनैः२ क्रमशः विरक्तिपूर्वक शुद्ध आत्मज्योति का प्रकाश एवं साक्षात्कार