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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 415 में से

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पृष्ठ 377

सौंदर्य लहरी ३२७

**अर्थ:—**जब वह संवित् ज्ञानशक्ति विशेष गुणों से युक्त होकर वर्णपदमंत्रविग्रहा अर्थात् पदों का रूप धारण करती है, तब वह शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनी व्यापिका (विभुः) रूप से शक्ति को जन्म देती है, फिर शक्ति से ध्वनि (महानाद), ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, उससे अर्धेन्दु फिर बिन्दु, उससे परा, परा से पश्यन्ती मध्यमा एवं वैखरी वाणी का जन्म होता है। वह तेजोमयी त्रिगुणात्मिका कुण्डलिनी जो इच्छाज्ञानक्रिया स्वरूपा है क्रम से वर्णमाला की सृष्टि करती है। वह विश्वात्मिका जब प्रबुद्ध होती है तब समस्त मंत्रमय जगत् को जन्म देती है।

नादरूपा की व्याख्या करते हुए श्रीभास्करराय कहते हैं कि

ह्रींकारादिषु बिन्दोरुपर्यर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्ति व्यापिकाः समनोन्मन्याख्याः सूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमरूपा अष्टौवर्णा वर्तन्ते तेषुतृतीयो रूपो वर्णोनाद इत्युच्यते। नाद एव रूपं यस्याः सा नादरूपा।

ह्रीं आदि मंत्रों में बिन्दु के ऊपर अर्धचंद्रिका, रोधिनी, नाद, नादान्त (ध्वनि या महानाद), शक्ति व्यापिका समनी और उन्मनी नाम वाले सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम ८ वर्ण होते हैं, उनमें तीसरा वर्ण नाद कहलाता है। नाद है रूप जिसका वह नादरूपा।

शक्ति के सूक्ष्मरूप को भी सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम भेद से त्रिविध समझना चाहिये, उसका सूक्ष्म रूप पंचदशी विद्या है, सूक्ष्मतर रूप कामकला बीजाक्षर और सूक्ष्मतम रूप कुण्डलिनी है। प्रथम के तीन विभाग हैं जिनको क्रमशः वाग्भवकूट, कामराजकूट

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