सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी
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किसी मंत्र की सिद्धि प्राप्त करने के लिये, उस मंत्र को सिद्ध गुरु के मुख से ग्रहण करना चाहिये । गुरु की शक्ति मंत्र के साथ शिष्य में प्रविष्ट होकर बीज का कार्य करती है, जो शिष्य के अंतःकरण रूपी क्षेत्र में श्रद्धा की वर्षा से पोषण पाकर अंकुरित होती है और दीर्घकालनिरंतरसत्कारामेवित् होने पर पूर्ण प्रकाश पाती है । इसलिये गुरु, मंत्र, शक्ति, और शिव चारों की एकता समझनी चाहिये । द्वैत की भावना में शक्ति और गुरु अथवा शिव का प्रत्यक्ष भेद दृष्टिगोचर होता है और अद्वैत की सिद्धि के साथ शक्ति की अपने अन्तरात्मा के साथ एकता अनुभव होने लगती है । इस प्रकार गुरु ईश्वर और आत्मा तीनों का एकीकरण अनुभव में आता रहता है ।
कहा है
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्ति भेद विभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तयेनमः ॥
श्रीभगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में शिवशक्ति की अभिन्नता और दूसरे में सत् कारणवाद की पुष्टि करते हुए तीसरे श्लोक में तीनों धर्म अर्थ काम की सिद्धि सहित अज्ञान तिमिर के नाशार्थ उपासना द्वारा मोक्ष प्राप्ति की ओर लक्ष्य कराया है । ६टे ७वें श्लोकों में बहिर्ध्यान और ८वें में भगवती के अभ्यंतर चिति शक्ति के चिदानंद लहरी स्वरूप को इंगित करके ९वें १०वें श्लोकों में तांत्रिक योग पद्धति के अनुसार षट्चक्रवेध की ओर साधकों का ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि बहिर् उपासना का पूर्ण फल कुंड-