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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी


बताना अत्यावश्यक है कि बिना गुरु के शक्तिपात रूपी अनुग्रह के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान का होना दुर्लभ ही नहीं असंभव है, कहा है:—

दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥

नहीं तो क्या यह आश्चर्य अत्याश्चर्य नहीं है कि ब्रह्म-सूत्रों के भाष्यकार एक ऐसे विषय को इतनी महानता दें, जो वेदांत की परिपाठी से सर्वथा असंगत हो । इस विषय का अधिक स्पष्टीकरण करने के लिये हम नीचे श्री वासुदेव ब्रह्मेन्द्र सरस्वतीजी के 'ब्रह्मशिका' नामक पुस्तक से संग्रहीत निम्न-श्लोक उद्धृत करते हैं:—

तत्वज्ञानेन मायायाबाधो नान्येन कर्मणा ।
ज्ञानं वेदांतवाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्व गोचरम् ॥
तच्चदेवप्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात् ।
जायते शक्तिपातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम् ॥

**अर्थ:—**तत्वज्ञान से ही माया का बाध होता है। अन्य कर्म से नहीं, जो ज्ञान वेदान्त के महावाक्यों द्वारा ब्रह्म और जीवात्मा के एकत्व की अनुभूति दिलाता है वह ज्ञान ईश्वर के प्रसाद से और गुरु के साक्षात निरीक्षण अथवा वचन से शक्तिपात द्वारा अधिकारियों में प्रकाशित होता है।

गीता में भगवान ने भी कहा है:—
" तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति "(गीता ४,३८)

**अर्थ:—**वह (ज्ञान) स्वयं योग सिद्ध को यथा समय अपने अन्तर में ही मिलता है।