सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० | सौंदर्य लहरी
करते हैं और योगिजन समाधि में; परन्तु उसके सौंदर्य की द्युति सर्वत्र है और उसको सौंदर्य की लहरी में आनन्द की लहर का योगी उपासक अपने अन्तर में अनुभव करते हैं। क्योंकि सौंदर्य का भाव, अधिभौतिक प्रायः दृष्टिगोचर होता है। परन्तु उसकी अध्यात्म प्रतिक्रिया आनन्द में व्यक्त हुआ करती है। हम तीन स्तरों पर एक ही तत्व की अनुभूति इस प्रकार करते हैं। प्रथम स्तर पर वह परमतत्व अद्वैत अक्षर परम ब्रह्म कहलाता है। जगत में उसकी अधिभूता अभिव्यक्ति के सौंदर्य की मोहात्मिका शक्ति का विकास है और अध्यात्म पर आनन्द लहरी का। हम कह चुके हैं कि नामरूपात्म जगत, आदि सत् शक्ति की परिणति है और उसके सौंदर्य में उसी आधिदेवी की सौंदर्य लहरी झलक रही है। इस दृष्टि से प्रथम ४१ श्लोकों का पूर्वार्ध जो अध्यात्म विद्या परक है-आनन्द लहरी नाम से संज्ञित किया गया है। आठवें श्लोक में चिदानन्द-लहरी और २१वें श्लोकोक्त परमानंद लहरी पद इस बात के स्पष्ट संकेत हैं; और अंतिम उत्तरार्ध विराट विश्व में आदि कारणभूता शक्ति जगज्जननी के मुख की सुन्दर झांकी दिखाता है। जैसा कि ४४वें श्लोकोक्त 'तव वदन सौंदर्यलहरी' पद से स्पष्ट है, आधि-भौतिक रूप, आधिदैव की ओर लक्ष्य कराता है। और ३५वे श्लोक में पिण्ड और ब्रह्मांड की एक समानता दिखाने के अभिप्राय से कहा गया है कि दोनों एक चिदानन्द के ही परिणाम मात्र है। क्योंकि यह देह आधिभौतिक तत्वों का ऐसा संघात है, जिसमें परम और अध्यात्म दोनों ही भावों की उपलब्धि होती है। जिनका प्रत्यक्षोक्षण आध्यात्म विद्या का विषय है। परम तत्व का ज्ञेयत्व दो भावों से प्राप्त होता है और उसकी अनुभूति अध्यात्म स्तर पर