भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

२२ सौंदर्य लहरी

प्राणियों का केन्द्रीभूत आकर्षण पद कृष्ण तत्त्व ज्ञान प्रधान तत्व का वाचक है; परन्तु वैष्णव सम्प्रदायों की द्वैत भावना उपासक को परम तत्व का आभोग मात्र प्रदान कर सकती है। और उस आभोग से तादात्म्यभाव न कराकर अपूर्ण रह जाती है। तथापि उस आनन्दावेश की अन्तिम पहुंच तादात्म्यभाव प्राप्त होने पर ही मिलती है, जैसी चैतन्य महाप्रभु के भावावेश में प्रायः प्रादुर्भूत हुवा करती थी। ज्ञानयोग को भावयोग की अपेक्षा से अभाव योग भी कहा जाता है। कहा है:—

“योगोहि प्रभवाप्ययौ” (कठ)

अर्थात योग दो प्रकार का है प्रभव योग और अप्यय योग। प्रभव योग का मार्ग आनन्दावेश का प्रभव पूर्वक मार्ग है, और अप्यय योग में मनोमय कार्य जगत का परम तत्व में लयक्रम किया जाता है।

शक्ति उपासनायें सब आनन्द भाव की ही योग पद्धतियां हैं। यद्यपि उनमें बहिर कर्मकांड का अधिक समावेश होने के कारण उनके अभ्यन्तर्योग मार्ग से सर्व साधारण की जानकारी नहीं होती, और वे लोग वास्तविकता से दूर रह कर सकाम अनुष्ठान में ही आमरण लगे रहते हैं। श्रीविद्या की अधिष्ठातृ देवी महा त्रिपुर सुन्दरी का स्वरूप चितिशक्ति कहा जाता है, परन्तु चिति-शक्ति को चिन्मयी मात्र मानने से उसकी उपासना ज्ञान परक ही नहीं समझनी चाहिये, वास्तव में वह भी आनन्दावेश युक्त भाव योग का ही मार्ग है, इसलिये श्री भगवत्पाद ने चिदानन्द लहरी और परमानन्द लहरी पदों का प्रयोग किया है।