भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२६ | सौंदर्य लहरी


सोने वाली कुण्डलिनी शक्ति है। जागने पर पशुराज सिंह पर बैठकर अर्थात रजोगुण को दबाकर मनुष्य की सब पाशविक वृत्तियों का संहार करती हुई शिव सायुज्य पदवी देती है। इसीलिये देवी पर पशु बली चढ़ाने की प्रथा पड गई है। मनुष्य अपने अभ्यन्तर पाशविक भावों की बलि न देकर बाह्य बलि देते हैं, और हिंसा करके जगत् जननी को सन्तुष्ट करना चाहते हैं।

या देवी सर्व भूतेषु चेतनेत्यभिधीयते, नमस्तस्यै ३ नमोनमः ।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता जगत् ,, ,, ,,

दुर्गा सप्तशति के ऊपर दिये हुवे श्लोकों का भाव अथर्वबेद के निम्न मंत्र में भी मिलता है, जिसका यह अर्थ है कि सब प्राणियों की चेतना भगवती का स्वरूप है। इसलिये हिंसा करना भगवती के स्वरूप की हिंसा करना है। अथर्वबेद का मंत्र यह है—

"ते देवा उपाशिक्षन् सा अजानात् वधू सती ।
ईशा वशस्य या जाया सा वर्णमाभ्रत ॥

**अर्थ:—**उन देवताओं ने जानना चाहा (कि इस शरीर में किसका वर्ण अर्थात प्रकाश है) तब वह सती वधू (उनकी इच्छा को) जान गई और उसने बताया कि ईश्वर की जो ईश्वरी जाया (पत्नि) है, वह इस वर्ण का आभरण करती है।

परम ब्रह्म की आदि संकल्प शक्ति जो प्रत्येक सर्ग में सृष्टि और स्थिति का कारण होती है और प्रलय के समय संहार रूपिणी