सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ३७
उसमें जो श्री है वह उसकी अपनी नहीं है, वह श्री ब्रह्म की ही प्रभा है, जैसा कि कहा है—
‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’
इसी अभिप्राय से शंकर भगवत्पाद कहते हैं—
‘न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि’
अर्थात यदि वह ब्रह्मदेव शक्ति से युक्त नहीं होता तो वह स्पन्दित होने में भी कुशल नहीं हो सकता था। ऋग्वेदीय उपरोक्त नासदासीय मंत्र में कहा है कि फिर उसकी महिमा के तप से एक (पुरुष) उत्पन्न होता है। हम कह आये हैं कि ब्रह्म का तप उसके ज्ञान का उन्मेश है अर्थात ज्ञान के उद्भव अथवा व्यक्त होने को ही तप कहा गया है, मानो शिवजी के नेत्र अर्द्धोन्मिलित से खुल जाते हैं। इस स्तर पर अहम् और इदम् दोनों का युगपद् ज्ञान उदय होता है। यह ज्ञानमय तप दूसरा स्पन्द है, जिसको सदारुय अथवा सदाशिव तत्व भी कहते हैं। इस अहम्-इदम् विमर्श वाले दूसरे स्पन्द को एक बीज के सदृश समझना चाहिये, जिसमें दो दल होते हैं परन्तु ऊपर से एक ही प्रतीत होता है। इस ही स्वरूप को अर्ध नारीश्वर अथवा अर्ध नारी नटेश्वर कहते हैं। देखें श्लोक २, ३। इस स्तर पर साधक योगी का तप भी ज्ञानमय ही होता है, अर्थात उसकी उन्नति साधन साध्य नहीं रहती वरन् पांचवी, छःटी, सातवी भूमिकाओं वाली ज्ञान साध्य होती है, ये जीवन मुक्ति की भूमिकायें कहलाती हैं। यह सदारुय तत्व सृष्टि करने की