भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी ३९


को माया अथवा अविद्या भी कहा जाता है। काम मन और संकल्पात्मक रेतस में काम महेश्वर का रूप है, और मन की शक्ति (रेतस) शुद्ध विद्या और सद्विद्या है और उसका परिणाम असद्विद्या है। शक्ति का परिणाम वर्णात्मक अर्थात्मक दो स्तरों पर होता है और वर्णात्मिका शक्ति को सरस्वती कहते हैं जिसका उदय कामना के उदय के साथ-साथ ही होता है और अर्थात्मिका शक्ति परिणत होकर समस्त विसर्ग का रूप धारण कर लेती है। वर्णात्मिका शक्ति को स्वरात्मिका भी कहते हैं कहा है—

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वंहि वषट्कारः स्वरात्मिका
(दु. श. ७३)

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता
अर्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः
(दु. श. ७४)

अर्थ— हे देवि, तू स्वाहा, तू स्वधा और तू ही व षटकार स्वरात्मिका है, अर्थात सब स्वर तेरे ही रूप हैं, तू स्वधा है। हे नित्ये ! और अक्षरो ! अकार, ईकार अथवा उकार और मकार की तीनों मात्राओं के रूप में तू स्थित है और अनुस्वार स्वरूपी अर्धमात्रा में भी नित्य स्थित है जिसका विशेष रूप से उच्चारण भी नहीं किया जा सकता अ+उ=ओ और आ+ए=ऐ से ओम और ऐं दोनों रूप लिये जा सकते हैं अथवा इकारस्य भावे ऐ भी लिया जा सकता है. ऐं सरस्वती बीज है. ई शक्ति वाचक है और ऐ स्वरात्मक भाव वाचक है और अनुस्वार शिव वाचक