भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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४२ सौंदर्य लहरी

से पृथिवी तत्व की प्रधानता लिये हुए वायु तत्व है । कं से जल भी लिया जाता है । इसकी पीठ मूलाधार है और आयतन काम, संकल्प और कामना तीनों में होने के कारण स्वाधिष्ठान और अनाहत् एवं आज्ञा चक्र तक है । वाक्शक्ति का संबंध संकल्पों से है, इसलिये ऐं का साथ क्लीं से है और शक्ति का प्रकाश कांति में होता है, इसलिये हीं का साथ श्रीं से है । ऐं क्लीं बाला मंत्र के अंग हैं, जो सब कामनाओं का देने वाला है, उसका दो प्रकार से प्रयोग किया जाता है । ह्रीं श्रीं को प्रथम रख कर अथवा उसे गर्भ में लेकर—इसलिये ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं और ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं दो रूप बन जाते हैं । यहां यह स्मरण रहे कि प्रत्येक मंत्र का आदि अक्षर अथवा बीजमंत्र सारे मंत्र का प्रमुख होकर उस मंत्र का संचालन करता है । मंत्र विज्ञान एक स्वतंत्र विज्ञान है जो पुस्तकों के आधार पर नहीं जाना जा सकता । जो लोग केवल पुस्तकों को पढकर किसी मंत्र का अनुष्ठान करते हैं, वे उस खिलाडी के सदृश हानि उठा सकते हैं जो तलवार चलाना न जानने के कारण अपना ही अंग काट लेता है । सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुकों को प्रत्येक मंत्र के उपदेश की दीक्षा किसी जानकार देशक (दीक्षा देने वाले) से मन्त्र रहस्य समझ कर लेनी चाहिये । क्योंकि मंत्रों का अनुष्ठान अग्नि के साथ खेल खेलने के सदृश है । यहां पर केवल मंत्र बीजों की भावना करने की विधि पर प्रकाश डाला गया है जिससे साधक विज्ञान को समझ कर तद्रूप भावना सहित अभ्यास बढावें क्योंकि कहा है कि विज्ञान को समझ कर अनुष्ठान करने से विद्या वीर्यवती होती है । यथा “ यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ।” (छा. १, १, १०)