सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ५७
विकारी मानने लगता है, और बुद्धि अपने को आत्मतत्व समझने लगती है । अनात्मनि आत्मख्याति रुपी यह अविद्या है । परन्तु शिवतत्व में अविद्या का अभाव होने से अध्यास नहीं होता । आत्मा में अहं इदं का कभी उदय होना कभी अस्त होना यह प्रकट करता है कि नित्य निर्विकार शुद्ध स्वरूप आत्मा दोनों से पृथक है । इदं सत्य है अथवा असत्य ! सत्यवत दिखता है, परन्तु अहं के आधार पर उसका उदय अस्त होने से उसकी असत्यता सिद्ध होती है । इसलिये इसको शंकर भगवत्पाद ने अनिर्वचनीय-ख्याति कहा है । अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि शक्ति की शक्तिमान से अभिन्न सत्ता रहते हुवे भी वह विपरीत धर्मा कैसे उदय-अस्त हुआ करती है । इसी अभिन्नता को लेकर श्रुति कहती है—“तदेजति तन्नैजति” (ईश)
<u>प्राणतत्व और अध्यात्म तथा आधिभूत भाव</u>
यदिदं जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( कठ २,६,२ )
अर्थ:— यह जो समस्त जगत है वह प्राण के स्पन्दित होने पर निकलता है । वह प्राण वज्र के सदृश्य बडा भय वाला है, अर्थात उसके भय से अग्नि तपता है और सूर्य उदय अस्त होता है । जो उसको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । ( क. २.६,३ )
प्राण यहां ब्रह्म वाचक है और वही जीवन शक्ति है । कहा है वह प्राण का भी प्राण है । उपरोक्त श्रुति में कहा गया है कि