भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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अवस्था भेदो में स्वरूप की अभेद अवस्था ९१ फलतः यह बात स्पष्ट है कि स्वप्नावस्था में, जाग्रत्-अवस्था के ही अनुभूयमान वेद्य पदार्थ, बाह्य स्थूल रूप में वर्तमान न होते हुए भी, मानसिक संकल्परूप में (ज्ञानरूप में) वर्तमान रहते हैं। इसी कारण से इस अवस्था का दूसरा शास्त्रीय नाम अधिष्ठान-अवस्था भी है। सावधान पुरुषों को इस अवस्था में, वैकल्पिक ज्ञानरूप में ही स्पन्दायमान स्वरूप की अनुभूति प्राप्त होती है। मुख्य सुषुप्ति-अवस्था—यद्यपि सुषुप्ति शब्द का अर्थ पूर्णस्वाप है तथापि आध्यात्मिक स्तर पर इसका अभिप्राय प्रगाढ़ निद्रा नहीं है। योग की प्रक्रिया के अनुसार यह समाधि की अवस्था है। इसको सुषुप्ति की संज्ञा इसलिए दी गई है कि इस अवधि में, वह जाग्रत् एवं स्वप्न का अनुभव करने वाला अनुभवित्ता ही, चिन्मात्र रूप में अवस्थित रह कर, जाग्रत् के ज्ञेयरूप और स्वप्न के वैकल्पिक ज्ञानरूप वेद्य पदार्थों को ग्रहण करने के प्रति पूर्णतया¹ सुप्त अर्थात् विमुख हो जाता है। फलतः इस काल में, वही पूर्वोक्त ²अधिष्ठातृरूप में (अन्तः- संवेदन के रूप में) वर्तमान प्रमेयभाव, जो कि बाह्य प्रमेयविश्व के बीज जैसे होते हैं, संस्कार रूप बन कर, मानो गहरी नींद में जैसे पड़े रहते हैं। इसका अभिप्राय यह कि सुषुप्ति काल में वेद्यता पूर्णतया गलकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है, प्रत्युत तावत्कालपर्यन्त संस्काररूप में वर्तमान रहती है। यही कारण है कि सुषुप्ति काल के बीत जाते ही अन्तः- संवेदन में फिर भी वेद्यता का उदय हो जाता है। शास्त्रकारों ने इस अवस्था को 'मुख्य मातृदशा'³ की संज्ञा दी है क्योंकि इसमें, तावत्काल पर्यन्त, ज्ञेयरूपता और वैकल्पिक ज्ञान- रूपता का सारा क्षोभ शान्त होने के कारण, प्रमाता मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहता है। तुर्या अवस्था—सुषुप्ति कालीन प्रमातृभाव अमित नहीं, अपितु मित ही है क्योंकि इस काल के बीतते ही, संस्काररूप में, विद्यमान वेद्यता फिर भी उदय में आ जाती है और चिन्मात्ररूपता पर भेदव्याप्ति का आवरण पड़ जाता है। अतः सावधान योगी, अपने अथक अनुसंधान के द्वारा इस अवस्था को लांघ कर, इसके उपरितन स्तर पर विद्यमान एक ऐसी अवर्णनीय अवस्था में प्रविष्ट हो जाते हैं जहां उनके मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं रहते हैं। इसको तुर्यावस्था कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह विशुद्ध ⁴प्रमारूप अर्थात् विरज, विमल, अखण्ड एवं सर्वतोमुखी चिन्मात्ररूपता की अवस्था है। यही अन्तिम १. अनुभूतो विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि । न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ।। (तं०, १०.२५८-५९) २. यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् । बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ।। (तं० १०.२५७-५८) ३. मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ।। (तं, १०.२६०) ४. यत्तु प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम् । पूर्णतागमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः । तत्तूर्यमुच्यते (तं० १०.२६५)