स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें·११६ स्पन्दकारिका प्रत्युत प्रत्येक शब्द, वर्ण, मात्रा अर्थात् मुख से उच्चारण की जाने वाली प्रत्येक ध्वनि 'मन्त्र' कहलाती है। इन वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठभूमि में भी वह आन्तर-विमर्श ही कार्य- निरत होता है। यही कारण है कि साधारण सांसारिक आदान-प्रदानों में भी मुख से उच्चा- रित ध्वनियां विचित्र प्रकार के प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। स्पष्ट है कि जब स्पन्दशक्ति का ही विकासमात्र होने के कारण साधारण से साधारण वर्ण भी कभी कभी कल्पनातीत हलचल को पैदा करने की क्षमता रखता है तो मन्त्र में ऐसी शक्ति क्योंकर नहीं हो सकती है ? १वास्तव में सारे वर्ण पररूप अर्थात् शिवरूप और उनसे बने मन्त्र शक्तिरूप हैं। तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार के मन्त्रों का उल्लेख मिलता है। साथ ही वहाँ पर, उनसे विशेष प्रकार के प्रभावों को उत्पन्न करने के लिये, उनके उच्चारणों और जपों की विशेष परिपाटियों और तदनुकूल विशेष वातावरणों एवं देश-कालों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया गया है। अनुभवी गुरुओं का कथन है कि यदि शास्त्रों में वर्णित नियमों का शत-प्रतिशत पालन करते हुये, मन्त्रों का अभ्यास किया जाये तो वे अवश्य मनचाहे प्रभावों को उत्पन्न कर लेते हैं। शर्त केवल इतनी है कि साधक को मन्त्रशक्ति का प्रयोग करने से पहले आत्मशक्ति की अनुभूति हुई होनी चाहिये। गुरुओं का कथन है कि २मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है। कसर इस बात की है कि पशुओं के चित्त की निर्मलता पर कुत्सित विकल्पों की काई जमी होती है अतः उनको अपनी ही शक्ति का परिचय नहीं होता है। आत्मबल की विस्मृति की अवस्था में मन्त्र का वीर्यहीन होना स्वाभाविक है और बार बार उच्चारण करने पर भी पतझड़ की मेघमाला के समान, उससे कोई अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हो सकता है। योगियों को मन्त्रशक्ति का अनुभव स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर ३अनुसन्धान करने के भगीरथ प्रयत्न से होता है, अन्यथा नहीं। वास्तव में स्वरूप का विकास ही ४मंत्रशक्ति का विकास समझना चाहिये। आन्तर अनुसन्धान के परिपक्व हो जाने पर मन्त्र के उच्चारणमात्र से ही अभीष्ट परिणाम प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ऐसी अवस्था में मन्त्रशक्ति ५स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है। आन्तर अनुसन्धान की क्षमता प्राप्त करने के लिये सबसे पहले अपने चित्त को निर्मल बनाना एक मौलिक आवश्यकता है क्योंकि निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाशपुञ्ज १. सर्वे वर्णात्मिका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये। (तं० स०, शि० सूत्र २.३ में उदाहृत) २. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया। तया हीना वरारोहे । निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥ (तं० स०, शि० सू० २. १ में उदाहृत) ३. तस्यानुसन्धानम्.......मन्त्रवीर्यस्यानुभवः । (शिवसूत्रवि०, १. २२) ४. शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा । (शिवसूत्र, २. १ उपक्रमणिका) ५. स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति । (शिवसूत्रवि०, १. २२)