स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri २. विद्या (विचारार्थक 'विद्' धातु)—विमर्श की वह उच्चतम भूमिका जिसके विकसित हो जाने पर, योगी में अकस्मात् यह विचार उत्पन्न हो जाता है कि मैं अनादिधर्मा हूँ अर्थात् स्वातन्त्र्यशक्ति ही मेरा वास्तविक स्वभाव है। ३. विद्या (ज्ञानार्थक 'विद्' धातु)—योगिसंवेदन की वह अवस्था जिस पर पहुँचकर योगी को, स्वयं ऐसा ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में मैं स्वयं ही शक्ति-केन्द्र शिव हूँ और यह समूचा विश्व मेरे ही स्वरूप की स्पन्दनामात्र है। संवेदन की ऐसी तीव्र अवस्था को शास्त्रीय शब्दों में 'उन्मना' अवस्था भी कहते हैं। फलतः सूत्रकार के मन्तव्य का निष्कर्ष यह कि योगी का संवेदन जब इतना परिपक्व हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करते ही उसके चित्त, मन्त्र और मन्त्रदेवता की सघन संवेदनात्मक एकाकारता हो जाती है तब मन्त्र, लिखित वर्णों की विशेष रचनामात्र न रह कर, एक ऐसी अमोघ शक्ति बन जाता है कि उससे कोई भी अभीष्ट फल अवश्य प्राप्त किया जा सकता है ॥२६-२७॥ [ आत्मसत्ता और संवेद्यविषय ] अगले तीन सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वेदकरूप आत्मसत्ता की व्यापकता केवल मन्त्रसमुदाय तक ही सीमित नहीं, प्रत्युत सारा वेद्यवेदक संक्षोभ ही स्वरूप का विकास है। फलतः जब भगवान् शिव सर्वमय है तो उसी का पशुरूप जीव भी वास्तव में सर्वमय ही है। योगी लोग अपने विशुद्ध संवेदन के द्वारा इस बात की अनुभूति प्राप्त करके जीवनमुक्त बन जाते हैं :— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥२८॥ सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरःपाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम् ॥२८॥ तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥२९॥ तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत् भोग्यमस्ति ॥२९॥ इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३०॥ एवंस्वभावं यस्य चित्तं, यथा—'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति', स सर्वं क्रीडा- त्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन वर्तते ॥३०॥