भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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तीसरा निःष्यन्द ‘विभूतिस्पन्द’ नामक तीसरा निःष्यन्द यहाँ तक के दो निःष्यन्दों में सामान्य स्पन्द-तत्त्व के स्वरूप का और उसमें समाविष्ट होकर सुप्रबुद्ध प्रमातृभाव पर आरूढ़ होने की प्रक्रिया का यथावत् वर्णन किया गया । अब प्रस्तुत निःष्यन्द में इस विषय की चर्चा की जा रही है कि उल्लिखित शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करके, अभ्यास की दृढ़ता से इस भाव पर स्थिर रहने के लिये सक्षम योगीश्वर में, अनेक प्रकार की पर एवं अपर सिद्धियाँ सहज ही में विकसित हो जाती हैं । इन सिद्धियों को दूसरे शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः अमितसिद्धियाँ और मितसिद्धियाँ भी कहते हैं । अमित- सिद्धियाँ तो उत्कृष्ट योगियों में अभिव्यक्त होने वाले सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्ता इत्यादि माहेश्वर धर्म ही होती हैं । परन्तु जहाँ तक मितसिद्धियों का सम्बन्ध है वे तो साधारण सांसारिक फलों को देनेवाली तुच्छातितुच्छ सिद्धियाँ होती हैं । असावधान योगी उनके चक्कर में पड़कर निःसंशय अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाते हैं । सांसारिक आसक्तियों में आकर्षण होता है, अतः सच्चे मुमुक्षु साधकों को, असाधारण कुशलता से, उनसे बच कर निकलना पड़ता है । पहुँचे हुये अनुभवी योगियों में भी विरले ही इतने धीर होते हैं जो तीव्र आत्मशक्ति से सांसारिक आसक्तियों को कुचल कर आगे बढ़ते हुये, अन्ततोगत्वा; ‘चक्रेश्वर पदवी’१ पर पहुँच कर ही विश्रान्त हो जाते हैं । [ योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य ] योगसिद्धियों का वर्णन करने के प्रसङ्ग में अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्-स्वातन्त्र्य और स्वप्न-स्वातन्त्र्य नामक सिद्धियों का और असावधान योगियों में पाई जानेवाली स्वातन्त्र्य की हानि का वर्णन किया जा रहा है— २यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् । सोमसूर्योदयं कृत्वा संपादयति देहिनः ॥३३॥ तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् । नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितोऽवश्यं प्रकाशयेत् ॥३४॥ १. द्रष्टव्य सूत्र सं० ५१ का विवरण. २. इन तीनों सूत्रों और इनकी वृत्तियों में भी भावों को अत्यधिक सूत्रात्मक भाषा के आवरण में रखा गया है । अतः, पाठकों के सुभीते के लिये, इनका भाषानुवाद करने में कुछ मात्रा तक स्वतन्त्रता बरती गई है ॥