भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 190 में से

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१२८ स्पन्दकारिका के) मध्यधाम१ (सुषुम्णाधाम) में प्रतिसमय स्फुटतर-रूप में प्रकाशमान रहता है और उनके२ प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता है ॥३४॥ इसके विपरीत— सूत्र—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर भी उस भाव पर निश्चलता से अवस्थित रहने के प्रति सावधान न रहे, तो उसके लिये जाग्रत् और स्वप्न दोनों पदों में भावों की सृष्टि उसी प्रकार स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है जिस प्रकार वह सर्वसाधारण लौकिक प्राणियों के लिए चलती रहती है । स्वतन्त्र रूप में भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते रहना तो स्पन्द-शक्ति का अकाट्य स्वभाव ही है ॥३५॥ जिस प्रकार— वृत्ति—एक ऐसे योगी को, जिसमें अभी स्वस्वरूप की पूर्ण अभिव्यक्ति न भी हुई हो, जाग्रत्-अवस्था में अपनी इच्छा के अनुसार, कोई खास अभिलषित पदार्थ ही दिखाई देता है चाहे उसके सामने दूसरे अनेकों पदार्थ भी वर्तमान क्यों न हों । इसका कारण यह है कि ऐसे अवसरों पर धाता उस योगी में सोम-सूर्य का उदय कर देता है, अर्थात् उसकी नेत्र इत्यादि ज्ञानेन्द्रियों में (उस अभिलषित ग्राह्य-विषय के प्रति) तीव्र अवधानात्मक शक्ति का उदय करता है । (साधारण जीव-व्यवहार में भी किन्हीं अवसरों पर ज्ञानेन्द्रियों में पाई जाने वाली इस तीव्र अवधानात्मक स्थिति का आभास)३ नटों या पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों में मिलता है ॥३३॥ उसी प्रकार— वृत्ति—(एक परिपक्व) योगी स्वप्न-अवस्था में भी अभिलषित पदार्थों का ही दर्शन कर लेता है । इसका कारण यह है कि धाता उसके प्रणय को अर्थात् आन्तरिक इच्छारूप- १. प्राणाभ्यास की दृष्टि से इसका अभिप्राय यह है कि मध्यनाड़ी का विकास हो जाने पर जिन योगियों के प्राण एवं अपान दोनों ऊर्ध्व-मार्ग में लय हुए हों उनको 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' प्राप्त हुआ होता है । २. इस स्तर पर अवस्थित योगियों की योगिसंकल्पात्मक अभ्यर्थना को 'प्रणय-रूपा अभ्य- र्थना' की संज्ञा दी गई है । आगे विवरण को पढ़ने का कष्ट करें । ३. यहाँ पर वृत्तिकार ने ज्ञानेन्द्रियों में उदित होने वाली तीव्र अवधानात्मक स्थिति का अनुभव कराने के लिए नटों एवं पहलवानों के प्रेक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इस उदाहरण की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती है । एक यह कि साधारण जीव-व्यवहार में भी, ऐसे प्रेक्षणों के अवसरों पर दर्शकों की ज्ञानेन्द्रियों में एक खास अवधानात्मक वृत्ति का उदय हो जाता है जिससे वे, प्रेक्षास्थलों पर दूसरी शतशः वस्तुओं के विद्यमान होने पर भी, केवल अभिलषित प्रेक्षण को ही देख लेते हैं । दूसरी यह कि योगाभ्यासी पुरुषों की ज्ञानेन्द्रियों में किसी खास अवधानात्मक शक्ति का उदय हो जाता है जिससे वे, नटों या पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों के जैसे कोलाहलपूर्ण एवं मानसिक विकारों को उपजाने वाले अवसरों पर भी अभिलषित स्वस्वरूप का ही साक्षात्कार कर सकते हैं ।