भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 190 में से

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१३० स्पन्दकारिका २. वृत्तिकार ने, दूसरे सूत्र में उल्लिखित 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' इन शब्दों का अर्थ—'यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यम्' इस प्रकार लगाया है : इसके अनुसार उसका अभिप्राय यह कि जिस योगी को पाञ्चभौतिक काया में रहते हुए और जीवन का प्रत्येक आदान-प्रदान करते हुए भी, प्रतिक्षण, 'मध्य' में अर्थात् सुषुम्णाधाम में 'हृदय' की अर्थात् स्वरूपभूत शाक्तस्पन्दना की अनुभूति स्फुटतर रूप में होती रहती हो, उसको जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों पदों में समानरूप से, भावमण्डल के सृष्टि एवं संहार की स्वतन्त्र अधिकारिता प्राप्त हुई होती है। इस कारण से इस स्तर के योगियों को परिपक्व योगियों का वर्ग कहा जा सकता है। इस सम्बन्ध में प्राणाभ्यास की दृष्टि से मध्यनाडी के विकास और ज्ञानमार्ग की दृष्टि से प्रमाणपद और प्रमेयपद के मध्यवर्ती प्रमातृपद पर अवस्थिति इत्यादि बातों पर पहले ही सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है। ३. तीसरे सूत्र में 'अन्यथा' शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ भट्टकल्लट ने 'स्वरूपस्थित्यभावे' लिखा है। इसका अभिप्राय यह कि किसी योगी को स्वरूप की अनुभूति तो हुई होती है परन्तु, अभी उस पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त करने से पहले ही वह संसार के शब्द आदि विषयों से आकृष्ट होकर अखण्ड आत्म-अनुसंधान की बात को सर्वथा भूल जाता है। ऐसे योगी और संसार के इतर सर्वसाधारण लोगों में कोई अन्तर नहीं है। इस स्तर के योगियों को असावधान योगियों के वर्ग में रखना युक्तियुक्त प्रतीत होता है। उल्लिखित योगियों में स्वातन्त्र्य का तारतम्य—इनमें से पहले प्रकार के योगियों को केवल जाग्रत् अवस्था पर स्वतन्त्र अधिकार होता है अर्थात् वे केवल इसी अवस्था में मनोनीत भाववर्ग का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'जाग्रत्-स्वातन्त्र्य' कहते हैं। दूसरे प्रकार के योगी जाग्रत् ओर ¹स्वप्न दोनों अवस्थाओं में, समानरूप से, अभि- लषित भावों का अनुभव करने में स्वतन्त्र होते हैं। स्मरण रहे कि प्रस्तुत सन्दर्भ में 'स्वप्न' से स्वप्न और सुषुप्ति² इन दोनों अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है। जहाँ तक जाग्रत् अवस्था का सम्बन्ध है, इन योगियों को उसकी स्वतन्त्र अधिकारिता पहले से ही सिद्ध होती है। फलतः परिपक्व योगियों की संकल्पशक्ति इतनी दृढ़ और तीव्र होती है कि वे तीनों पदों में समानरूप से स्वरूप पर अवस्थित रह सकने के कारण, प्रत्येक पद में मनोनीत विषयों का ही अनुभव करते रहते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं। १. स्वप्नपद में बाह्य इन्द्रियों का कार्यकलाप बन्द रहने के कारण केवल मन से ही भावों का ग्रहण होता है। (द्रष्टव्य—स्प० का०, ४. ३-४) २. स्वप्नेन परात्मप्रपञ्चेक्षितम् । (स्व० त्रि०, ३. १-२)