भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 169

CC-0.In Public Domain Digitization by eGangotri पुर्यष्टक १५९ से बना होता है । तन्मात्र अवस्था, शब्द आदि पाँच ज्ञेय विषयों की मूलभूत सामान्य अवस्था को कहते हैं । इस अवस्था में उनमें किसी प्रकार की १विशेषता उत्पन्न नहीं हुई है । उदाहर- णार्थ २'गन्धतन्मात्र' गन्ध की उस सामान्य-अवस्था को कहते हैं जिसमें अभी सुगन्ध, दुर्गन्ध, तीव्रगन्ध, मन्दगन्ध, तेल का गन्ध, इत्र का गन्ध, सड़ी लाश का गन्ध इत्यादि विशेषतायें प्रकट न हुई हों, अपितु सामान्य रूप में मात्र गन्धत्व की वर्तमानता हो । 'रस' इत्यादि के विषय में भी यही सिद्धान्त है । तन्मात्ररूप में वर्तमान शब्द आदि विषयों का बाह्य स्थूल इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है जब कि विशिष्टरूप में विकसित होने पर; बाह्य इन्द्रियों के द्वारा, इनका ग्रहण सहजरूपों में किया जा सकता है । ऐसे ही बने तन्मात्ररूप शब्द आदि पाँच ज्ञेय-विषयों और मनस् इत्यादि तीन अन्तःकरणों से बने हुये, सूक्ष्म शरीर को पारिभा- षिक शब्दों में 'सूक्ष्म-पुर्यष्टक' कहते हैं । दूसरे शब्दों में इसको 'वासना-पिण्ड' भी कहते हैं । स्थूल-शरीर भी त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि, अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके संवेद्यविषय तन्मात्रों के ही कार्यरूप आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इन पाँच स्थूल- महाभूतों के मिश्रण से बना हुआ होता है । सूक्ष्म तन्मात्र ही जब अपनी सामान्य-अवस्था को छोड़ कर विशिष्ट-अवस्था में अभिव्यक्त होते हैं तब स्थूल, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध कहलाते हैं और इन्हीं के कार्य स्थूल पञ्चमहाभूत होते हैं । फलतः स्थूलभूतों की मूलावस्था भी तन्मात्र ही होते हैं । ३स्थूलभूतों का रूप धारण करते समय, ये तन्मात्र आपस में एक निश्चित क्रम के अनुसार मिल जाते हैं । वह क्रम इस प्रकार है— सामान्य रूप विशेषरूप १. शब्द-तन्मात्र शब्द गुण वाला स्थूल आकाश । २. शब्द-स्पर्श तन्मात्र स्पर्श गुण वाला स्थूल वायु । ३. शब्द-स्पर्श-रूप तन्मात्र रूप गुण वाला स्थूल तेज । ४. शब्द-स्पर्श-रूप-रस तन्मात्र रस गुण वाला स्थूल जल । ५. शब्द-स्पर्श-रूप-रस गन्ध तन्मात्र गन्ध गुण वाली स्थूल पृथिवी । स्थूलशरीर में इन पाँच महाभूतों की अवस्थिति निम्नलिखित प्रकार से मानी जाती है— १. नाड़ियों इत्यादि के पोले भाग जिनके मध्य में शून्य अवकाश होता है; आकाश के रूप में 'शब्द-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । २. पाँच स्थूल प्राण, वायु के रूप में 'स्पर्श-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । १. अनुद्भिन्नविशेषतया स गन्धादिरेव केवलस्तन्मात्र इत्युक्तम् । (तं० वि०, ९.२८१) २. पृथिव्यां सौरभान्यादिविचित्रे गन्धमण्डले । यत्सामान्यं हि गन्धत्वं गन्धतन्मात्रनाम तत् ॥ (तं०, ९. २८०-८१) ३. एतत्संसर्गवशात् स्थूलो विषयस्तु भूतपञ्चकताम् । अभ्येति नभः पवनस्तेजः सलिलं च पृथिवी च ॥ (प० सा०, २२) द्रष्टव्य इसी कारिका की विवृति भी । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal