स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें८ स्पन्दकारिका अस्तु, यद्यपि बहुमत इसी मान्यता के पक्ष में है तथापि इस सम्बन्ध में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये निष्पक्ष शोधकार्य की आवश्यकता है । स्पन्द क्या है ? शिवशक्तिसामरस्य ही, सदाशिव तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक, सारे जड़-चेतनात्मक विश्व का आधार-भूत एवं शाश्वत यथार्थ है । स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी कहते हैं । इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है । शिव और शक्ति अथवा प्रकाश और विमर्श यह केवल कहने-सुनने के लिये मात्र औपचारिक द्वित्व है । वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक सामरस्य है । अस्तु, विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है । यदि प्रकाश में प्राणभूत स्पन्दना न हो तो प्रकाश की सत्ता ही क्या ? शक्तिहीन शिव की कल्पना शव की कल्पन अधिक नहीं । फलतः प्रकाशरूप शिव की, निजो अभिन्न, अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है और स्पन्दना ही शिव का स्वातन्त्र्य है । स्पन्दशक्ति में ज्ञातृता और कर्तृतारूप स्वातन्त्र्य शक्ति के पाँच मुख हैं—'चित्, निर्वृत्ति (आनन्द), इच्छा, ज्ञान और क्रिया' से चित्ता और आनन्दता शिव के साथ इस रूप में घुले-मिले हैं कि इनका मात्र कल्पनात्मक पार्थक्य भी सम्भव नहीं । मौलिक शिवभाव खण्डित रूप में 'चित्' और 'आनन्द' नहीं, अपितु अखण्डबोध से ग्राह्य 'चिदानन्द' है । इच्छा यद्यपि इनका ही स्थूलरूप है तथापि शिवभूमिका पर उसका वैसा रूप नहीं जैसा कि पशुभूमिका पर है । शिव पशु के समान, स्थूल रूप में, न कभी आम खाना चाहता है और न कभी पेड़ ही गिनना चाहता है । शैव मान्यता के अनुसार, उस भूमिका पर इच्छा का रूप चित्ता और आनन्दता का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अभ्युपगम- मात्र (शिवत्व में इन दोनों की वर्तमानता का स्वीकार) है । इस अभ्युपगम में भी, बहिर्मुखीन उन्मुखता न होने के कारण, इच्छा भी शिवत्व में ही विश्रान्त अवस्था में वर्तमान है । शेष रह जाते हैं ज्ञान और क्रिया । इन्हीं दो रूपों में शाश्वत शक्ति-स्पन्दना, पतिभूमिका और पशुभूमिका पर युगपत् ही, स्पन्दायमान है । फलतः ज्ञातृता और तदनुकूल कर्तृता (सब कुछ जानने और करने का स्वातन्त्र्य = पूर्णकर्तृत्व) यही स्पन्दशक्ति का स्वरूप है और यही उसमें स्वातन्त्र्य है । इसी स्वातन्त्र्य के द्वारा वह ग्रहीता-भूमिका, ग्रहण-भूमिका और ग्राह्य-भूमिका पर युगपत् ही स्पन्दायमान है । शक्ति के पाँच मुखों का यह अभिप्राय नहीं कि ये पाँच प्रकार की भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं । वास्तव में शक्ति एक ही है । इसका मूलरूप स्वतन्त्र चित्ता (चिन्मात्ररूपता) है । यह शक्तिमान् से अभिन्न है । चित्ता का ही स्थूल रूप आनन्द, आनन्द का ही स्थूलरूप इच्छा, इच्छा का ही स्थूलरूप ज्ञान और ज्ञान का ही स्थूलरूप क्रिया है । शिव, सृष्टि संहार आदि पाँच कृत्य करता है क्योंकि उसमें ज्ञान है; वह जानता है क्योंकि उसमें इच्छा है, वह चाहता है क्योंकि उसमें आनन्द है, वह आनन्दमय है क्योंकि वह पूर्णचैतन्य है । फलतः चित्ता ही शिव और शिव ही चित्ता है । केवल 'शिवशक्तिसामरस्य' है ।