भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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१० स्पन्दकारिका स्पन्दशास्त्र में प्रमाता के भेद स्पन्दशास्त्र की मान्यता के अनुसार मूलतः पूर्णचेतन स्वस्वभाव, ऊपर से नीचे तक, एक ही प्रमाता है। स्वतन्त्र एवं आनन्दमय होने के कारण वह दो रूपों में अवस्थित है। पहला पतिप्रमाता और दूसरा पशुप्रमाता। पतिप्रमाता के रूप में वह, विश्वमय विकास का विश्वोत्तीर्ण रूप है अतः इस रूप में उसके अवान्तर भेदों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पशुप्रमाता के रूप में वह विश्वोत्तीर्ण का विश्वमय विकास है। इस रूप में वह व्यष्टिरूप और विशिष्ट है। अतः उसके भेद, उपभेद और आकार-प्रकारात्मक वैचित्र्य इतने हैं कि उनकी गणना मानव की संकुचित कल्पना में नहीं आ सकती है। पाञ्चभौतिक काया को धारण करनेवाला प्रत्येक जङ्गमस्वरूप या स्थावररूप प्राणी 'पशुप्रमाता' है। प्रत्यभिज्ञा के आचार्यों ने अहंता और इदन्ता के उतार-चढ़ाव के आधार पर, विश्व को शुद्ध-मार्ग में और अशुद्ध-मार्ग में बांटकर, इन पर अवस्थित प्रमाताओं के विभिन्न एवं विविध स्तरों का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत किया है, परन्तु स्पन्द-शास्त्रियों के मतानुसार शिवप्रमाता के अतिरिक्त अन्य सारे पशुप्रमाता हैं चाहे वे सदाशिव-कोटि या पृथिवीकोटि पर अवस्थित हों। हाँ, उन्होंने केवल इनमें पाये जानेवाले बोधात्मक संकोच या विस्तार के आधार पर अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध इन चार श्रेणियों में बाँटकर रखा है। आगे सूत्राङ्क १७ के विवरण में इन चारों श्रेणियों पर यथासम्भव प्रकाश डाला गया है। प्रमाताओं के ग्राह्यविषय पतिप्रमाता के लिये समूचा जड़-चेतनात्मक विश्व अभिन्न अहम्-रूप में ही ग्राह्य है। पशुप्रमाताओं के ग्राह्यविषय दो प्रकार के हैं—१. आभ्यन्तर और २. बाह्य। आभ्यन्तर ग्राह्यविषयों में सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीनों अन्तःकरण-धर्मों के साथ सम्बन्धित भावनात्मक और बाह्य ग्राह्यविषयों में शब्दात्मक, स्पर्शात्मक, रूपात्मक, रसात्मक और गन्धात्मक स्थूल पदार्थ अन्तर्भूत हो जाते हैं। आभ्यन्तर विषय मानसिक अनुभूति के द्वारा और बाह्य- विषय पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्राह्य हैं। इन बाह्य ग्राह्यविषयों और आभ्यन्तर ग्राह्यविषयों का बोध क्रमशः नील और सुख इन दो पारिभाषिक शब्दों से हो जाता है। इस सम्बन्ध में यह तथ्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि पतिप्रमाता की अपेक्षा से पशुप्रमाता स्वयं भी ग्राह्यकोटि में ही पड़ जाता है। पाश कौन सा है ? प्रत्येक पशु के हृन्मंडल में, निगूढ़ रूप में अवस्थित ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दशक्ति के वास्तविक स्वतन्त्र एवं सामान्य रूप का अपरिचय ही, उसके लिये पाश है। संसार की भूमिका पर अवस्थित सारे जड़ या चेतन पदार्थ सामान्य शक्ति के ही विशिष्ट रूप हैं। विशिष्ट होने के कारण आपस में भिन्न और पारस्परिक भिन्नता के कारण परस्पर-सापेक्ष हैं। यह पारस्परिक सापेक्षता ही भौतिक द्वन्द्वात्मकता है। द्वन्द्वों की चक्की के दो पाटों में फँसा हुआ जीव लगातार पिसा जा रहा है और युग-युगों तक (जबतक उसको पारमेश्वर शक्तिपात का स्पर्श न हो जाय) आवागमन के चक्कर में पड़ा ही रहता है। साधारण शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि विश्वात्मक एकत्व को भूलकर वैविध्यमय भेदज्ञान की गहराइयों