स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें२० स्पन्दकारिका मुख्य एवं असंकुचित रूपों में सततविकासशील होती हुई, विशेष-भूमिका अर्थात् पशुदशा (जीवभाव) में प्राण, अन्तःकरण, बाह्य-इन्द्रियां इत्यादि अनन्त प्रमेयों के रूपों में प्रवहमान है। प्रतिप्रमाता¹ की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ही उसकी आनन्दघनता; आनन्द का चमत्कार ही इच्छा-शक्ति; प्रकाशरूपता ही चित्-शक्ति; विमर्शमयता ही ज्ञानशक्ति और प्रत्येक प्रकार के आकार इत्यादि को अवभासित करने का सामर्थ्य ही क्रियाशक्ति है। इससे² स्पष्ट होता है कि यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च मौलिक स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है। ऐसे अनन्तरूपों के होते हुए भी यह स्वातन्त्र्यशक्ति मुख्यतः इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन तीन रूपों में, शाश्वत रूप में स्फुरित रहती है। पतिभाव में ही नहीं अपितु पशुभाव में भी शक्ति का यही इच्छा- त्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप प्रतिपल कार्यनिरत रहता है। कोई भी प्राणी जिस वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसकी अन्तःचेतना में पहले ही अभिन्न रूप में अवस्थित होती है। अनन्तर ज्ञान के द्वारा उसको जानकर, क्रिया के द्वारा कार्यरूप में परिणत करता है। संक्षेप में कहा जाता है कि प्राणी जो कुछ चाहता है वही जानता भी है और करता भी है। इसी प्रकार पतिदशा में ही इष्यमाण विश्वकल्पना, पहले इच्छाशक्ति में अभिन्न रूप में अव- स्थित रहती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति के द्वारा उसका विमर्श होकर क्रियाशक्ति के द्वारा बाह्य अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार एक ही मौलिक पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति, अपने स्वातन्त्र्य से इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया का व्यपदेशमात्र धारण करती है। ये सारे व्यपदेश उन्मेष में आनेवाली मायाशक्ति³ के सामर्थ्य से ही उत्पन्न हो जाते हैं। क्योंकि केवल शिवदशा को छोड़⁴ कर अन्य सभी दशाओं में मायाशक्ति का ही साम्राज्य छाया रहता है। स्मरण रहे कि इदंभाव को अवभासित करने की ओर उन्मुख बनी हुई स्वातन्त्र्य-शक्ति ही 'मायाशक्ति' कहलाती है। यह शक्ति की वह अवस्था है जिसमें आगामी भेदकल्पना भरी हुई तो होती है परन्तु उसका विभाग नहीं हुआ होता है। यह स्थिति कुछ उसी प्रकार की होती है जिस प्रकार सेम⁵ की फली के गर्भ में आगामी अनन्त फलियों की कल्पना अविभक्त रूप में अवस्थित रहती है। अस्तु, इस विषय पर यथा स्थान प्रकाश डाला जायेगा। यहां पर केवल इतना ध्यान में १. तस्य च स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः, प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः, आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः। (तं० सा० ६ पृ०) २. तस्मात्संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं यत्तदप्यलम् । विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यति शक्तिषु ।। (तं० : १.१६०) ३. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी । भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथा हि स तया कृतः ।। (तं०, १. १४९-५०) ४. शिवदशामेकां मुक्त्वा मायाशक्तिः सर्वत्र कृतपदा । (स्प० वि०, ६ पृष्ठ) ५. अत एव बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य शिम्बिकाफलवत् अस्यां गर्भीकारोऽस्ति । (तं० वि०, ९. १५१)