स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस सम्बन्ध में यह बात विचारणीय है कि आन्तर-विमर्श एक थैला जैसा नहीं कि जिसमें अनन्त पदार्थों की कल्पनायें ¹अखरोट, पिस्ते या बादाम इत्यादि की तरह ठसाठस भरी हुई होती हैं और फिर वही अलग-अलग रूप में बाहर निकलती रहती हैं। ऐसी कोई बात समझ में नहीं आती है अपितु कुम्हार जैसे प्रत्येक चेतन प्रमाता के अन्तर्विमर्श में सारे वाच्य पदार्थ विमर्श के ही रूप में अर्थात् 'अहं' से अभिन्न रूप में ही अवस्थित रहते हैं। साथ ही विमर्श में ही यह स्वातन्त्र्य होता है कि अपने में अभिन्नरूप में अवस्थित पदार्थों को भिन्न रूप में साकारता प्रदान कर सकता है। बाह्यरूप में अवभासित होने के अनन्तर वह कल्पनायें समाप्त नहीं होती हैं अपितु फिर भी अन्तःचेतना में निलीन होकर अवस्थित² रहती हैं क्योंकि यदि वे समाप्त ही हो जातीं तो सम्भव था कि कुम्हार एक घट को साकारता प्रदान करने के अनन्तर दूसरे उसी आकार-प्रकार के घट को बना नहीं सकता। ठीक इसीप्रकार सर्वोत्कृष्ट शाङ्कर स्तर पर भी उस विश्वस्पन्द में यह सारा इदंरूप अर्थात् संकुचित प्रमाता, प्रमेय और प्रमाणों से भरा कार्यजगत् अनादिकाल से 'अहं रूप' एकाकारता में अवस्थित ही है। उसी मौलिक अहं परामर्श में, स्वातन्त्र्य से ही, जो इदन्ता का परामर्श उदित हो जाता है वही बाह्य-प्रमेयता का विकास कहलाता है। फलतः आन्तर विमर्शरूप में अवस्थित भाववर्ग को भेदमय प्रमेयता की नानारूपता में अवभासित करना और अवभासित करने के अनन्तर उनको फिर भी विमर्शात्मक एकाकारता में निलीन करना ही स्वभाव अथवा स्वातन्त्र्य अथवा आनन्द शक्ति अथवा उन्मेष-निमेषमय स्पन्द की शाश्वत क्रीडा का चमत्कार है। यदि परमार्थ दृष्टि से देखा जाए तो यह बात स्पष्ट रूप में समझ में आती है कि वे सारे प्रमेय पदार्थ जो स्फुट³ रूप में अर्थात् 'इदं' रूप में भासमान हैं, वास्तव में परमार्थ सत्ता के निजी अवयव ही हैं। अतः स्वरूप में अवस्थित रहते हुए ही, केवल मायाशक्तिरूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, उनका उसी प्रकार भिन्न रूप में जैसे अवभासन हो जाता है, जिस प्रकार घटरूप पदार्थ का अवभासन मिट्टीरूप सत्ता के अन्तर्गत ही होता है। यदि मिट्टी की सत्ता न हो तो घट की भी सत्ता नहीं होगी। यदि भाव स्वरूप में अवस्थित न हों तो वे भाव नहीं होंगे। अनुत्तरतत्त्व और जीव का अन्तर इस सम्बंध में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी आवश्यक है कि बाह्यरूप में १. एतदुक्तं भवति न प्रसवेकादिवाक्षोटादि तत् तस्मात् निर्गतम्' । (स्प० नि०, १० पृष्ठ) २. स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ॥ अस्त्येव···· ···· ···· ····॥ (ई० प्र०, १-५ १०) ३. वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तर्विद्यमानामेव प्रसवे बहिरात्मना ॥