स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 5, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदरणीय स्वामी मुक्तानन्द जी का आशीर्वाद स्पन्दकारिका काश्मीर शैव-सिद्धान्त का एक उत्तम ग्रन्थ है । स्पन्द-शास्त्र वैज्ञानिक है । आधुनिक वैज्ञानिकों ने ऐसा पता लगाया है कि जगत् की उत्पत्ति एक बड़े प्रथम स्फोट के स्पन्दन से हुई है, जो अभी भी स्पन्दित हो रहा है और विश्व का विकास चालू है । लेकिन वे लोग अभी तक स्पन्द के मूल का पता नहीं लगा सके हैं । किन्तु हजारों वर्ष पूर्व के काश्मीर के शैव-सिद्धान्त के स्पन्द-शास्त्र ने बताया है कि परम तत्त्व की चैतन्य-शक्ति का स्फुरण ही वह स्पन्द है । इस चेतनामय प्रकाश-विमर्श-रूप परमेश्वर शिवजी के संकल्परूप उन्मेष- मात्र से जगत् की उत्पत्ति हुई है । ज्ञानेश्वर महाराज ने परमेश्वर की यह सतत-स्थिति का वर्णन 'विश्वविकसित मुद्रा' के शब्दों से किया है । इस रहस्य को प्रकट करनेवाला यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है, जानकर बड़ी खुशी हुई । आधुनिक वैज्ञानिक अपने ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए इस ग्रन्थ का उपयोग अवश्य करेंगे । अमेरिका में वैज्ञानिकों की सभा में मैं स्पन्द-शास्त्र का ज़िक्र हमेशा करता हूँ और वे इस विषय में उत्साहित रहते हैं और इसके बारे में ग्रन्थ पढ़ना चाहते हैं । इस उत्तम काश्मीरीय दर्शन का प्रसार करने में श्री नीलकण्ठ गुरुटू जो योगदान दे रहे हैं, इसका मैं स्वागत करता हूँ । वे महापुरुषों की संगति में तत्त्वान्वेषण करके सत्य का ज्ञान पाये हुए पुरुष हैं । इस ग्रन्थ में प्रतिपादित सत्य-दर्शन के ज्ञान द्वारा विश्व की जनता का कल्याण हो— इति आशीर्वाद । स्वामी मुक्तानन्द