स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंसारभाव की शान्ति ६७ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः, तस्मात् तम् अधिष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन्, विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता सृतिः सरणं न भवति ॥११॥ अनुवाद सूत्र-जो कोई साधक स्वभाव अर्थात् स्पन्दात्मक आत्मरूप का ही, विश्व के कण- कण में अनुस्यूत रहने वाली मुख्य सत्ता के रूप में साक्षात्कार करता हुआ, विस्मय की जैसी मुद्रा में अवस्थित रहता है, वह इस तिरस्कार से पूर्ण और कुत्सित आवागमन के चक्कर में कैसे पड़ सकता है ? ॥११॥ वृत्ति-तो इस पूर्वोक्त प्रकार से जब यह बात सिद्ध है कि आत्मस्वभाव अर्थात् सामान्य स्पन्दतत्त्व विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अनुस्यूत और प्रत्येक प्रकार के सामर्थ्य से युक्त है, तब जो कोई भी योगी उसी स्वभाव को अधिष्ठाता के रूप में अर्थात् सर्वव्यापक रूप में अनुभव करता हुआ विस्मय की जैसी अवस्था में अवस्थित रहता है उसको कुत्सा अर्थात् जघन्यता से पूर्ण सृति अर्थात् आवागमन का झंझट नहीं होता है ॥११॥ विवरण 'तुर्यदशा' अथवा दूसरे शब्दों में 'शाक्तभूमिका' पर आरूढ़ होने का इच्छुक योगी संसार का सारा कार्य-कलाप करते-करते ही, संसार के तुच्छातिच्छ पदार्थों में भी स्वभाव- भूत स्पन्दरूपता के प्रसार एवं विकास को अनुभव करने का निरन्तर अभ्यास करता रहता है। धीरे-धीरे अभ्यास की परिपक्वता, शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन, परमेश्वरीय अनुग्रह और सद्गुरुओं के कृपा-कटाक्ष से उसकी भावनायें तुच्छ शरीर इत्यादि पर आत्माभिमान रखने की संकुचित परिधियों से निकलकर विश्वात्मभाव अथवा पूर्ण 'अहं विमर्श' पर आरूढ़ हो जाती हैं, ऐसी अवस्था में उसकी चित्-रूपता पर विद्यमान मायीय घन आवरण स्वयं ही हट जाता है, चतुर्दिक चित्प्रकाश के किरणजाल का स्वर्णिम एवं शाश्वत आलोक मुखरित हो उठता है और उसकी आत्मा शरीर में रहते हुए भी 'तुर्या-अवस्था' का साक्षात्कार कर लेती है। उसके लिए चिरन्तन सत्य के रुद्ध किवाड़ अकस्मात् खुल जाते हैं और वह भैरव भूमिका पर आरूढ़ होने का अधिकारी बन जाता है। १भाव यह कि ऐसा साधक निरन्तर अभ्यास करने से, चारों ओर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के विकास का अनुभव करता हुआ, तुरीया- दशारूप स्वच्छन्द भूमिका के क्षेत्र में प्रवेश पा सकता है। प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक स्थान पर अपनी ही चित्रूपता की अधिष्ठातृता अर्थात् वास्तविक अथवा मौलिक व्यापकता का यथार्थ अनुभव करने से, उसको, विश्व की सारी भङ्गियाँ, २किसी जलाशय की उठने वाली तरङ्गों, अग्नि की ऊपर की ओर उठने वाली लपटों अथवा सौरमण्डल से निकलने वाले १. योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ।। (स्व० तं०, ७.२५७-८) २. जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभाङ्गयो यथा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्गयो विनिर्गताः ।। (वि० भै०, ११०) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal