स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri थोड़ा स्पष्ट करने के लिए यहाँ पर इन दोनों मतवादियों के सिद्धान्त का संक्षिप्त पर्यालोचन करना आवश्यक है। अभावब्रह्मवाद—इस वाद के अनुसार अभाव रूप अथवा असत्-रूप कारण से भावरूप या सद्रूप कार्य की उत्पत्ति मानी गई है। इसका तात्पर्य यह है कि इस भावरूप में दिखाई देने वाले स्थूल-जगत् की सृष्टि से पहले किसी पदार्थ की सत्ता भावरूप में न होने के कारण चारों ओर अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही भावरूप में दिखाई देने वाले जगत् की सृष्टि स्वयं हो गई है। ये लोग अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित उपनिषद्वाक्य को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं— 'असदेवेदमग्र आसीत्.........'॥ (छान्दोग्य० ३.१९.१) कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि से पहले असत् ही असत् था अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का अभाव था। प्रलय के पश्चात् भी सारा जगत् अभाव में ही लय होगा अतः वास्तव में अभाव ही यथार्थ-सत्ता है। ब्रह्म का वास्तविक रूप भी अभाव ही है। इस अभाव की निरन्तर भावना करने से सारी सांसारिक उथल-पुथल का उच्छेद हो जाता है क्योंकि वेदकसत्ता और वेद्यसत्ता दोनों अभाव में ही लय हो जाती हैं। अभाव में लय होना ही जीवात्मा की वास्तविक मुक्ति है। फलतः अभावसमाधि की परिपक्वता प्राप्त करके आत्मा का अभावरूप परब्रह्म में लीन होना ही सारी साधना का चरमलक्ष्य है। शून्यवाद—बौद्धों की १माध्यमिक शाखा के प्रसिद्ध एवं उद्भट विद्वान् नागार्जुन और उसके समकक्ष कई अन्य विद्वानों ने बौद्ध-दर्शन में 'सर्वशून्यवाद' की स्थापना की है। ये लोग इस वाद को 'सर्ववैनाशिकवाद' भी कहते थे। यह एक ऐसा वाद था जिसके अनुसार किसी भी प्रकार के पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं स्वीकारा गया था। भगवान् अभिनवगुप्त ने अपने तन्त्रालोक में इन लोगों को २'सर्वापह्नवहेवाकधर्मा' के नाम से पुकारा है। उनके विचारानुसार इन लोगों ने प्रत्येक प्रकार के ज्ञातृरूप, ज्ञानरूप और ज्ञेयरूप पदार्थों के अनस्तित्व पर दुराग्रह करने का ठेका ले रखा था। इनके मत का संक्षिप्त निष्कर्ष यह है कि यह सारा दृश्यमान स्थूल जगत् वास्तव में शून्य का ३विवर्तमात्र है। शून्य के अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थ अथवा ज्ञान की निजी कोई सत्ता नहीं है। शून्य का स्वरूप न ४सत्, न असत्, न सदसत् और न सदसत् से भिन्न है। यथार्थ शून्य वही है जहाँ इन चारों में से कुछ भी न हो। यह शून्य ही ५पारमार्थिक सत्य है १. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, डा० बलदेव उपाध्याय, पृ० १५२-६१। २. 'सर्वेषां ज्ञातृज्ञानज्ञेयानाम् 'अपह्नवों' निराकरणं तत्र 'हेवाक' एव 'धर्म:' स्वभावो यस्यासौ बौद्ध:।' (तं० वि०, १.५६) ३. मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्। (भा० द० पृष्ठ १३२) ४. न सन् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम्। चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥(मा०का०) भा०द० पृष्ठ ५६३ पर उदाहृत ५. अन्यथा न होने वाली, वास्तविक और प्रमाणों से परिपुष्ट यथार्थ।