स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ स्पन्दकारिका 'दूसरे पक्ष में यदि अभाव वास्तव में कोई भाव्य वस्तु ही है तो वह अभाव का भी अभाव होने के कारण स्वयं एक सत्ता ही बन जाता है। विशेष बात तो यह है कि अभावभावना का उप- देश देने वाला गुरु और उसको ग्रहण करने वाला शिष्य दोनों को इस बात की पूर्णचेतना होती है कि हमारी सत्ता विद्यमान है, हम चेतन हैं; हममें ज्ञान क्रिया रूप वेदकताभाव विद्यमान है परन्तु उनको 'मैं नहीं हूँ' की भावना करके अपने ही अस्तित्व का स्वयं अपलाप करना पड़ता है। फलतः उनके लिए 'अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः' वाली बात चरितार्थ हो जाती है। उनसे न तो अपनी सत्ता का अपलाप करते और न उसको स्वीकारते ही बनता है। अभाववादी दावा करते हैं कि अभावसमाधि में सर्वाभावरूप विश्वोच्छेद ही भावना का विषय बन जाता है। इस विषय में विचारणीय बात यह है कि यदि '२विश्वोच्छेद' का अर्थ प्रत्येक सत्ता का अभाव है तो अनुभवित्ता का भी स्वतः उच्छेद होने के कारण उस विश्वोच्छेद का अनुभव ही कौन करेगा ? विश्वोच्छेद दशा का अनुभव करने के तत्काल ही अनुभवित्ता का भी उच्छेद होगा क्योंकि विश्वोच्छेद (होने की निश्चित प्रक्रिया) में वह कोई अपवाद नहीं होगा। अब यदि यह माना जाये कि विश्व का उच्छेद होने पर भी अनुभवित्ता का उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र की कल्पना के समान ही होगी। साथ ही इस में एक और कठिनाई उपस्थित हो जाती है। वह यह कि विश्वोच्छेद की कल्पना करने में भावना का भी उच्छेद होना आवश्यक मानना पड़ेगा। भावना का उच्छेद मानने पर भी विश्वोच्छेद की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है क्योंकि स्वतः उच्छेद की कल्पना तो अवशिष्ट रहेगी ही। फिर यदि उच्छेद के उच्छेद की कल्पना की जाये तो उस उच्छेद के उच्छेद की कल्पनाओं का गोरखधन्धा कभी समाप्त ही नहीं होगा और परिणाम यही होगा कि सर्वाभाव कभी भी सिद्ध ही नहीं होगा। अनुभवित्ता की सत्ता तो किसी न किसी रूप में अवशिष्ट रहेगी ही। प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने अभाव-समाधि के विषय में एक विशेष प्रकार के दोष का उल्लेख किया है। वह यह कि अभावसमाधि, जिस रूप में अभावब्रह्मवादी इसको स्वीकारते हैं, वास्तव में मूढता, अर्थात् विशेष प्रकार की जड़ता, जिसमें किसी प्रकार की संवेदना नहीं रहती है, की अवस्था है क्योंकि इस समाधि का अभ्यास करने वाला योगी समाधि से उठने के अनन्तर उस समाधिकालीन दशा का स्मरण जैसा करता हुआ कहने लगता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़ता की अवस्था में पड़ा हुआ था और अब मेरी वह अवस्था बीत गई है।' जिस समाधि में अपने आप में अपने ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य का आभास न रहे वह समाधि यथार्थ समाधि की अवस्था नहीं, प्रत्युत मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यक्ति के १. भावनाया भाव्यवस्तुविषयत्वादभावस्य न किञ्चित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किञ्चित्त्वे सत्यभावत्वाभावात् । (स्प० नि०, १.१२) २. किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः, भावकाभ्युपगमे तु न विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् । (स्प० नि०, १.१२)