भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri विषयानुक्रमणिका पहला-निःष्यन्द विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १ शक्तिमान् की वन्दना और स्पन्द-शक्ति का स्वरूप । १ १५ २ कर्तृता और कार्यता २ २५ ३ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वभाव की व्यापकता । ३ ३० ४ सुखिता, दुःखिता इत्यादि अनुभूतियों में एक ही अनुभावी की वर्तमानता । ४ ३४ ५ स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका का स्वरूप और स्पन्द-शक्ति की पारमार्थिक सत्ता । ५ ४२ ६ स्पन्द-शक्ति की अनुस्यूतता से ही जड़ इन्द्रियों में चेतना का संचार । ६,७ ४५ ७ मित-प्रमाता और आत्मबल । ८ ५० ८ क्षोभ के लयीभवन से परमपद में प्रतिष्ठा का लाभ । ९ ५४ ९ क्षोभ के लय होने पर स्वाभाविक ज्ञातृता और कर्तृता की अभिव्यक्ति । १० ६३ १० अभ्यास की दृढ़ता से अपने अन्तस् में ही स्पन्द-शक्ति की अनुभूति । ११ ६६ ११ अभाव-ब्रह्मवाद और सर्वशून्यवाद की अमान्यता । १२ ७१ १२ अभाव-समाधि की कृत्रिमता । १३ ७७ १३ कार्यता की भङ्गुरता और कर्तृता की अभङ्गुरता । १४ ८० १४ अभाव की भावना करने वाले साधक की अबुद्धता । १५ ८१ १५ अन्तर्मुखीन चित्-रूपता की अनश्वरता । १६ ८२ विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १६ प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध योगियों में स्वरूप-अनुभूति का तारतम्य । १७ ८४ १७ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वरूप-उपलब्धि के विभिन्न रूप । १८ ८९ १८ स्वरूप-उपलब्ध हो जाने पर विशेष-स्पन्दों की बाधकता का अभाव । १९ ९२ १९ अप्रबुद्ध व्यक्तियों की आत्म-चेतना पर विशेष-स्पन्दों का आवरण । २० ९५ २० स्पन्द-शक्ति की अनुभूति के लिये निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता । २१ १०१ २१ जाग्रत् अवस्था में किन्हीं निश्चित अवसरों पर स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि । २२ १०४ २२ शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुख योगी की संकल्प-बद्धता, योगिक प्रक्रिया और अन्तिम लयीभवन । २३, २४, २५ १०७ दूसरा-निःष्यन्द १ मन्त्रों में आत्म-बल का संचार और उनकी वास्तविक शिवरूपता । १, २ ११२