स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
१७४ स्पन्दकारिका सर्वशून्यता ७१ संवित् १६, १९, २२, २३, २५, २९, ६७, सर्वशून्य-वाद ७२ ७७, ८८, ९३, ९४, १०२ सर्वज्ञत्त्व ५८ संवित्-भट्टारिका ३९, ४२, ४९, ५६, ८९ सहजविद्या ११२ संवृति-सत्य ७३ सहज-स्वातन्त्र्य ४५ संवेदन १२० सामरस्य ६५ संसार दशा ४५, ४९, ५६, ५९, ६५, ८७ सामान्य-प्राणना ४१ संस्कार ३६ सामान्य-स्पन्द ९२, ९३, १०१, १०३, १०५, संस्कार-सिद्धान्त ४० १४० संस्कृत-विकल्प १०३ सामान्य स्पन्दमयी } ६९ स्पन्द-तत्त्व ४४, ५०, ७७, १०१ १३४, अहंता १४३ सामान्य-स्पन्दमयी } ७०, ११३, १३९ स्पन्दरूपता ६७ शाक्त-भूमिका स्पन्द-शक्ति १५-१९, २१, ४६, ६७ ९३, सामान्य-स्पन्द-शक्ति २१, २५, ९३, ११०, १०१, १३७ १४१ स्पन्दात्मक-चैतन्य ३५ सुखिता ३७, ३८, ३९, ९४, ९५, ९६ स्पन्दात्मक-स्वभाव ३५, ४५, ११५, १४० सुप्रबुद्ध ८४, ८५, ८६, ८७ स्पन्दात्मक-स्वातन्त्र्य २८, ४५ सुप्रबुद्ध-भाव ८६, ८७ स्पन्दायमान २९, ५६ सुप्रबुद्ध-भूमिका ९५ स्पन्दमयी-पूर्णाहिन्ता ५४ सुषुप्ति ३१, ३२, ३३, ४३, ७४, ७७, ७८, स्पर्श २४, ३३, ४८, ५४, ६२, ६८, ८२, ७९, ९१, ९२ स्फुटतम-विकल्प १०२ सुषुम्णा-मार्ग ११० स्फुरणा १७, १९ सृष्टि ४५, ४८, ५६, ५८, ६४, ७२, स्फुरत्तारूपा संवित् ७५ सोम-सूर्य १०९, १२८ स्मर्यमाण ५५, ६७, ७१, ७७, ७८ सौषुप्त-पद ७७ स्मृति ३०, ३३, ४१, ७८ संकल्प ३२ स्वप्न ३१, ३२, ३३, ३४, ८५, ८९, ९४ संकल्पात्मक } २१ स्वप्न-स्वातन्त्र्य १२९, १३१ गतिमयता स्वभाव २९, ३५, ३९, ५३, ५४, ६३, ६५, संकल्पात्मक } १५, १७, १८ ७१, ७२, १५१ स्फुरण स्वरूपाभास १४१, १४४ संकोच १८, ४८, ५५, ५८ स्वरूप-विश्लेषण १४४ संघट्ट १५६ स्वरूप-ख्याति ७५ संतान १५२ स्वरूप-विकास २५, १४३ संधि-क्षण १०६, १३७ स्वरूप-समावेश ६९
परिशिष्ट-II १७५ स्वरूप-साक्षात्कार ७० स्वलक्षणाभास ३५, १४१ स्वस्वरूपनिष्ठ ७० स्वस्वरूपभूत ६९, १४४, १५५ सामान्य-स्पन्दात्मकता ६९, १४४, १५५ स्वातन्त्र्य ५६, ५८, ५९, ६० स्वातन्त्र्य-शक्ति १६, १७, १९, २०, २१, ४६, ५१, ५४, ५६, ५७, ६५, ९९ १५३ स्वात्म-विस्मृतिरूप-अख्याति ५५ स्वात्म-संकोच ६५ ह हृदय १६, १७, ६५ क्ष क्षण ९८ क्षणपर्यवसायी ३२ क्षणिक-विज्ञान ३५ क्षोभ ५४, ५५, ६०, ६१, ६३, ६६, १३८, १५० ज्ञ ज्ञाता ६४ ज्ञातृता ५६, ६३, ६४, ७५ ज्ञातृत्व २२, २८, ६७, ज्ञान ४१, ५६, ५८, ६४, ७४, ७५, ८५ ज्ञानेन्द्रियाँ ४६, ४८, ९७ ज्ञान-क्रियात्मक-चैतन्य २९, ७४, ७८ ज्ञान-क्रियात्मक-प्रमातृसत्ता ७७ ज्ञान-क्रियामयी-सत्ता १९ ज्ञानक्रियारूप-वेदकता ७४ ज्ञान-शक्ति २०, ४३, ५५, ५५, ९६ ज्ञान-सन्तान ३५ ज्ञान-क्षण ३५, ४० ज्ञान-ज्ञेयरूपा-शक्ति ७८ ज्ञेय ७५, ९० ज्ञेयरूप ३२, ९०, ९१
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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स्पन्दकारिका प्रो० नीलकंठ गुरुटू शिवशक्तिसामरस्य सदाशिवतत्त्व से लेकर पृथ्वी- तत्त्व तक सारे जड़चेतनात्मक विश्व का आधारभूत एवं यथार्थ स्वरूप है । स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी कहते हैं । इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है । वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक सामरस्य है । विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है । फलतः प्रकाश-रूप शिव की निजी अभिन्न अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है । संस्कृत भाषा से अपरिचित किन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए मूल सूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया गया है । भाषानुवाद के साथ-साथ हर एक सूत्र पर अलग- अलग विवरण भी लिखा गया है ताकि रुचि-सम्पन्न पाठकों को सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखने वाली शैव मान्यताओं को समझने में सहायता मिले । ग्रंथ के आरम्भ में विस्तृत भूमिका तथा अन्त में पारिभाषिक शब्दों की अनुक्रमणिका भी जोड़ दी गई है । मूल्य : रु० (सजिल्द) ४५ (अजिल्द) ३०