स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
स्पन्दकारिका प्रो० नीलकंठ गुरुटू शिवशक्तिसामरस्य सदाशिवतत्त्व से लेकर पृथ्वी- तत्त्व तक सारे जड़चेतनात्मक विश्व का आधारभूत एवं यथार्थ स्वरूप है । स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी कहते हैं । इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है । वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक सामरस्य है । विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है । फलतः प्रकाश-रूप शिव की निजी अभिन्न अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है । संस्कृत भाषा से अपरिचित किन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए मूल सूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया गया है । भाषानुवाद के साथ-साथ हर एक सूत्र पर अलग- अलग विवरण भी लिखा गया है ताकि रुचि-सम्पन्न पाठकों को सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखने वाली शैव मान्यताओं को समझने में सहायता मिले । ग्रंथ के आरम्भ में विस्तृत भूमिका तथा अन्त में पारिभाषिक शब्दों की अनुक्रमणिका भी जोड़ दी गई है । मूल्य : रु० (सजिल्द) ४५ (अजिल्द) ३०