भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

२४ स्पन्दकारिका (२) प्रथमाभासित नील तद्ग्राहकभावापेक्षा से संहर्तृत्व है । (३) अवभासमान पीत तद्ग्राहकभावापेक्षा से स्रष्टृत्व है । (४) विच्छिन्नताभासापेक्षा से स्थिति हेतुता है । (५) अन्तःसंस्काररूपतापादित आभासापेक्षा से विलयकारित्व है ।१ (६) शुद्धसंविदैक्यापन्न प्रविलापित स्मृत्यादि बीजाभावाभास की अपेक्षा से अनुग्रहीतृत्व है ।२ इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि ऐसी कोई भी दशा नहीं है जिसमें कि परमात्मा का पञ्चकृत्यकारित्व सिद्ध न हो—'सर्वदा सर्वासु दशासु पञ्चविधकृत्यकारित्व माहेश्वरमेव एक रूपं सर्वत्र जृंभमाणमेव स्थितम् इति ।।'३ चिच्चक्रैश्वर्यात्मा में स्वस्वभाव शङ्कर रूप स्वप्रकाश में किसी योगी की धिषणा अधिरोहण करती है किन्तु संसारी लोगों की नहीं ।४ जो कुछ भी आभासित होता है वह सब कुछ 'प्रकाश' मात्र है क्योंकि अप्रकाश में प्रकाश की वर्तमान युक्ति संगत नहीं है— 'यावत् किञ्चित आभासते तत् सर्वं प्रकाशमयमेव अप्रकाशस्य प्रकाशनानुपपत्ते इति युक्ति- वशेन स्वप्नसंकल्पादिदौ संविद एव आभासोल्लासहेतुत्वं दृष्टम् ।'५ अर्थात् संकल्पादि में भी संवित् तत्त्व का उल्लास ही मूल कारण है ।६ सामान्य अनुभव भी यही ज्ञापित करता है कि प्रकाशस्वरूप भगवान् शिव का प्रकाश यह विश्व है: 'अनुभवानुसारेण च प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् ।'७ 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—उस परमात्मा की शक्तियों का चक्र (संयोजनादि- वैचित्र्य-व्यवस्थित समुदाय) । 'विभव' = वह विश्व समुदाय ही उसका वैभव या स्फीतता है । 'प्रभवः'—उसकी उत्पत्ति । (प्रभवति अस्मात् इति प्रभवः) 'अवभासन' परमार्थस्वस्वभाव ही है जो उसको । कहा भी गया है— 'यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥' 'शक्तिचक्र'—(दूसरा अर्थ)—इन्द्रिय वर्ग । 'विभव'—निज निज विषय प्रवृत्त्यादिक वैभव ।। 'प्रभवं'—उसका प्रादुर्भाव । कहा भी गया है— 'यतः करणवर्गोऽयं विमूढो मूढवत् स्वयम् । सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥' (१।६)८ आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि इस श्लोक के द्वारा 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' शिव का ही कुलत्रिकादि प्रतिपादन किया गया है । आम्नायों के उपदेशों के द्वारा स्वस्वभाव शङ्कर का ही यहाँ प्रतिपादन किया गया है न कि वेदान्तियों के ब्रह्म का । क्योंकि वेदान्तियों का ब्रह्म विश्वातिरिक्त है—'विश्वं यत्र तदेव ब्रह्म' ।९ क्षेमराज अपने शब्दों में कहते हैं— 'शङ्करः इति उपपादितम् न तु वेदान्तवादिवत् 'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म ।'१० १-७. स्पन्दसन्दोह । ८. स्पन्दकारिका । ९-१०. स्पन्दसन्दोह ।