भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः २७ (२) स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति, स इमान लोकानसृजत् । (उसने इच्छा की कि लोकों की सृष्टि करूँ । उसने लोकों की सृष्टि की)१ (३) स ईक्षांचक्रे, स प्राणमसृजत् ॥२ (उसने इच्छा की और प्राण का सृजन किया) आदि इच्छाशक्ति महात्रिपुरसुन्दरी हैं । ‘तं’ = उन भगवान् परमशिव को । ‘स्तुमो’ (नुमः) = नमस्कार करते हैं । ‘शङ्करं’ = ‘शं’ = ‘भोगापवर्गाख्यं शं’ = श्रेय या सुख ॥ (‘भोगापवर्गाख्यं शं श्रेयः सुखं वा करोतीति शङ्करः’)३ ‘स्तुमः’—कैसी स्तुति? ‘तत्स्वरूपानुवेश एव स्तुतिः । कः स्तोता? कः स्तुत्यः? का वा स्तुतिः?— क्योंकि—भगवद्व्यतिरेकेण न च स्तुत्योऽस्ति मानिनाम् ।’४ स्तुति क्यों ? क्योंकि वह ‘भगवान’ है । भगवान् क्यों है? क्योंकि—उसमें छः भग विद्यमान हैं—भग क्या है? ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य ज्ञानस्य यशसः श्रियः । वैराग्यस्य च मोक्षस्य षण्णां भग इति स्मृतः ॥५ ऐश्वर्यस्य समग्रस्य भूतानामगतिमगतिम् । वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्यो भगवानिति ॥६ ‘शक्तिचक्रविभवप्रभव शङ्कर’—भगवान् शङ्कर ‘प्रभव’ (शक्तियों के उत्पत्ति- स्थान्) हैं वे अपने को ७ प्रमाताओं के रूप में प्रकट करते हैं जो निम्न हैं—१. शिव २. मन्त्रमहेश्वर ३. मन्त्रेश्वर ४. मन्त्र ५. विज्ञानाकल ६. प्रलयाकल ७. सकल ॥ वे समस्त शक्तियों के स्वामी हैं—उनके बीज हैं । ‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः’—‘शक्तिचक्र विभवप्रभव’ शङ्कर की ही वन्दना क्यों ? शक्ति-रहित स्वतन्त्र शङ्कर की वन्दना क्यों नहीं ? क्योंकि— १. शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि । अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरञ्चादिभिरपि प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥७ भाव यह कि यदि ‘शिव’ शक्ति से युक्त न रहे तो वे इतने अशक्त एवं असमर्थ हो जायेंगे कि अपने स्थान से हिल भी नहीं सकते ॥ २. ‘शिव’ पद में इकार शक्ति का वाचक है । यदि इसे निकाल दिया जाय तो ‘शिव’ ‘शव’ मात्र शेष रह जायेंगे । ‘तं स्तुमः’—‘तं कम्’ (उस किसको?)८ ‘उसको’ जिसके उन्मेष से—औन्मुख्य से, जगत् का (विश्व का) ‘प्रभव’—(सन्तति) निष्पादित होता है: ‘यदुन्मेषादौन्मुख्या- ज्जगतो विश्वस्योदयः प्रभवः सन्ततिरिति यावत् ॥९ ‘निमेषात्’—‘जिसके विश्राम से १. ऐतरेयोपनिषद (१।१।१) । २. प्रश्नोपनिषद (६।३) । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत । ६. विष्णुपुराण । ७. शंकराचार्य (सौन्दर्यलहरी) ८-९. स्पन्दप्रदीपिका ।