स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ स्पन्दकारिका २८-२९. पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं शिवत्व की व्यापकता २७२ ३०. जीवन्मुक्ति का स्वरूप एवं विश्व के साथ ऐकात्म्य-प्रतिपत्ति २८४ ३१-३२. तदात्मता महासमापत्ति २९० तृतीय निष्यन्द—विभूतिस्पन्द निष्यन्द ३३-३४. योगियों की यथाकांक्षित अभीष्टों की तत्काल सिद्धि ३०४ ३५. योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम ३१५ ३६-३७. स्वबल का महत्त्व ३१६ ३८. स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति ३२२ ३९. स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ ३२५ ४०. ग्लानि और उसकी निवृत्ति ३२९ ४१. उन्मेष का स्वरूप ३३३ ४२. यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन ३३७ ४३. प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा प्रथमाभास ३४२ ४४. प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति करने विषयक योगोपदेश ३४६ ४५. पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति ३५१ ४६. विकल्पात्मक ज्ञान परामृतरस एवं स्वातन्त्र्य दोनों से वंचित होना ३६२ ४७. स्वरूपाच्छादन और उसके कारण ३७४ ४८. शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य ३८० ४९-५०. संसरण के कारण और पुर्यष्टक की भूमिका ३९० ५१. भोक्तृभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति ३९८ ५२-५३. गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट द्वारा स्पन्दकारिका के प्रणयन की पुष्टि ४१०