भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

प्रथमः निष्यन्दः ४५ है—(१) अन्तरोन्मुखी (२) बाह्योन्मुखी। समस्त क्रिया संकल्पमूलक है। 'शङ्कर' अनु- त्तर तत्त्व है शक्ति उसका सार या हृदय है—'सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'१ 'स्पन्दशक्ति' उछलनात्मक है—'स्वात्मन्युच्छलनात्मकः'२ स्पन्द एक साथ ही स्वरूप का विकास एवं संकोच दोनों कर सकती है। यहाँ 'उन्मेषनिमेष' संकल्पात्मक गतिमयता मात्र का बोधक है। यह संकल्पात्मक गतिमयता ही शैव दर्शन में 'इच्छाशक्ति' है। 'इच्छा शक्ति' शिव (शङ्कर) का स्वभाव है—नित्य धर्म है। संकल्प या इच्छाशक्ति को ही यहाँ 'उन्मेष-निमेष कहा गया है। 'उन्मेष' या 'निमेष' दोनों संकल्प मात्र के ही द्योतक हैं। 'उन्मेष' = यह वह अवस्था है जब कि पारमात्मिक संकल्प में विश्वोत्तीर्ण रूप (विशुद्ध चिन्मात्र स्वरूप) में अवस्थान की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में— विशुद्ध चिन्मयी रूप में रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस समय समस्त 'इदं मम' (या प्रमेय मात्र) अहं रूप (विशुद्ध चिन्मात्र प्रमाता) में लीन रहता है। यही है पारमेश्वरानुग्रह या 'शक्तिपात' है। 'निमेष' उस अवस्था का द्योतक है जब कि परमात्मा के संकल्प में (स्वरूप को अनन्त भेद संकलित वैचित्र्यों में प्रसारित करने हेतु सिसृक्षा की उन्मुखता होती है। इस अवस्था में चिन्मात्र प्रमाता, अभिन्न प्रमेयता, माया शक्ति के कारण पृथक् विकास पा लेती है यही है 'तिरोधान'। पारमात्मिकी संकल्प इन्हीं दो रूपों में व्यक्त होता है। वे हैं— (१) अन्तर्मुखस्पन्द एवं (२) बहिर्मुखस्पन्द। 'उन्मेषनिमेष शब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बंधिप्रति- पाद्यते। स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः तस्य उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ॥'३ पारमेश्वर संकल्प—(१) 'अंतर्मुखस्पन्द' (२) 'बहिर्मुखस्पन्द'। 'स्पंदशक्ति' की यह उभयोन्मुख गति युगपद चलती रहती है शिव एवं शक्ति की स्वतन्त्र इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया या स्वतन्त्र ज्ञातृत्व, स्वतन्त्र कर्तृत्व में (उन्मेष-निमेष दोनों स्थितियों में) कोई अन्तर, परिवर्तन नहीं आता। जगत् का आविर्भाव (सृष्टि) एवं प्रलय केवल जगत् का होता है न कि संवित् का। उन्मेषावस्था में स्वरूपातिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के प्रमेयजाल का अस्तित्व नहीं रहता। यह जगत् की प्रलयावस्था है यह स्वस्वरूप में लय की अवस्था है। निमेषावस्था में प्रमेयता का स्वरूप से पृथक् अस्तित्व न होने के कारण जगत् का आविर्भाव होता है। दोनों रूपों में परिवर्तन, परिणमन केवल जगत् का होता है। 'संवित्' का नहीं। संवित् सदा अक्षुण्ण रहती है। १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४) २. तन्त्रालोक। ३. स्पन्द वि०, पृ० ४।