स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ स्पन्दकारिका है—यह कथन अनुपयुक्त है। उपयुक्त कथन यह है कि—'चैतन्य ही आत्मा है।' चेतन-अचेतन—घट को स्वविषयक एवं परविषयक चेतना नहीं है—न वह अपने को जानता है और न तो दूसरों को। इसीलिए वह अचेतन कहा जाता है— 'घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते, स्वात्मा न परामृश्यते, न स्वात्मनि तेन प्रकाश्यते, न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेत्यत् इत्युच्यते ॥'१ चैत्र (नामक चेतन व्यक्ति) चेतन होने के कारण चैतन्य-विभूति से समवेत होने के कारण 'अहं' रूप वाली चेतना द्वारा स्वात्मरूप में एवं अपने से पृथक् नील, पीत, सुख, दुःख (या इनके अभावात्मक शून्य) को भी अवभासित (अनुभूत) करने में स्वतन्त्र है अतः चेतने वाला होने के कारण 'चेतन' रूप में अभिहित किया जाता है— 'चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते... नील- पीतसुखदुःखतच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन अवभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यत इत्युच्यते ॥'२ 'चैतन्य', शक्ति के प्रसाररूपात्मक विश्व का अहमात्मक विमर्शन है—'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा'३ चैतन्य की विशेषता यह है कि उसमें स्वप्रकाशयता होती है किन्तु जड़ पदार्थों में नहीं— 'चैतन्यमजडा सैवं, जाड्ये नार्थप्रकाशता ॥'४ 'अथापि जडमेतस्य कथमर्थ प्रका- शता।'५ आत्मा चैतन्य प्रधान होने के कारण ही 'चिदात्मा' कहलाती है—'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः'६ । उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥' (प्र० कारिका १।४४) 'स्वातन्त्र्य' ही इसका (आत्मा का = चैतन्य का) मुख्य लक्षण है—'स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यम्' (ई० प्र० १.५.१३) आत्मा का चैतन्य-प्राधान्य ही स्पन्द में आत्मा का विशेष लक्षण है। आत्मा का चैतन्य प्राधान्य— आत्मात् एव चैतन्यं, चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदितस्तेन, जडात्सहि विलक्षणः ॥ (प्र०का०) एकात्मिका शक्ति एवं शक्तित्रय—परमात्मा से अभिन्न उसकी जो 'स्वातन्त्र्य शक्ति है वह जब विश्व के रूप में प्रकट होने की ओर उन्मुख होती है तो वह सर्वप्रथम जिस शक्ति का रूप धारण करती है उसका नाम है 'इच्छाशक्ति'। यही इच्छा शक्ति अपने विकास के अग्रिम चरणों में 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' के रूप में प्रकट होती है। ज्ञान एवं क्रिया का युग्म विभूति सागर है क्योंकि प्रमेयों की आवश्यकता के अनुसार उनमें अनन्त शक्ति-प्रवाहों के अनन्त निर्झर फूट पड़ते हैं और शिवतत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक समस्त विश्व-वैचित्य आकार ग्रहण कर लेता है । (१) 'ज्ञानशक्ति'— (१) वर्ण (२) पद (३) मन्त्र के रूपों में एवं (२) 'क्रियाशक्ति'—(१) कला (२) तत्त्व एवं (३) भुवन के रूपों में—प्रसृत होकर विश्वाकारित हो उठती है । इस प्रकार समस्त १-३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३) । ४-६. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।