स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ स्पन्दकारिका अवभासित पदार्थ का अपने में लय भी कर सकती है और अपने एकत्व को अनेकत्व में अवभासित भी कर सकती है। दोनों को धारण भी कर सकती है और दोनों से पृथक् भी रह सकती है। ‘स्पन्दशक्ति’ रूपिणी विमर्शात्मक स्फुरण। के बिना ‘प्रकाश’ की कल्पना व्यर्थ है। विमर्शहीन प्रकाश बिम्ब को ग्रहण करने की क्षमता रखने पर भी जड़ है। ‘विमर्श’ क्या है—इसका स्वभाव क्या है। ‘विमर्शो हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति' आत्मानं परोकरोति उभयं एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्याभावयति इत्येवं स्वभावः ॥’१ विमर्शात्मक स्फुरण से रहित ‘प्रकाश’ (शिव) की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि विमर्शशून्य प्रकाश जड़ होता है— ‘स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा। प्रकाशोऽर्थो परक्तोऽपि स्फटिकादि जडोपमः ॥२ ‘स्पन्द’ के ‘किंचिच्चलन’ का अर्थ—‘किंचिच्चलन’ ही स्पन्द का स्वभाव बताया गया है किन्तु यह किंचिच्चलन है क्या? स्वतन्त्र रूप में स्फुरित होने की सामर्थ्य ही किंचिच्चलन का स्वभाव है। निरपेक्ष स्वातन्त्र्य ही स्पन्द की विशेषता है। ‘किंचिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत्। उमिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥’ (तं० ४.१८४) संवित् समस्त कालों में प्रमेय एवं प्रमाता दोनों रूपों में सतत स्फुरण युक्त है। स्पन्द या स्फुरण संवित् पयोधि की तरंग है। स्पन्द एवं संवित् एक ही अभिन्न ज्ञान- क्रियामयी सत्ता है। यही है संवित् तत्व का संवित्, जो कि विमर्शमय एवं सतत् स्पन्दमय है, इसी कारण संवित् प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय भावों में) स्वतन्त्र ‘अहं’ रूप में विमर्श कर सकता है। रत्नाकर की विशेषता यही है कि वह कभी तरंगों से तरंगित है एवं कभी अतरंगित है : ‘निस्तरंगतरंगादिवृत्तिरेव ही सिन्धुता ॥’३ संवित् का संवित्त्व यही है कि वह विश्व का अहंवरूप में विमर्श करे ‘इदमेवं संविदः संवित्त्वं यत्—‘सर्वम् आमृशतीति’ (लं० वि०४।२१४)। आनन्दात्मक स्वातन्त्र्य शक्ति की चमत्क्रिया यही है कि—संविद्रूप विश्वात्मा अपनी स्पन्दात्मिका स्वतन्त्रता की सामर्थ्य द्वारा अपना स्वरूपाच्छादन करके अक्रम में क्रम एवं क्रम में अक्रम का अवभासन नामक क्रीड़ा करता है। ‘स्पन्दशक्ति’ प्रत्येक क्रिया के निष्पादन में स्वतन्त्र है— (१) ‘सत्ता च भवनकर्तृत्ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥’४ (२) एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढौकयति निजरूपम्। पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिव रसम् ।५ १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.११)। ३. तं० ४.१८४। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ५. तं०सा० पृ० ७।