भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः ६९ जगत् का कारण तत्त्व— १. आचार्य शङ्कर—ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है । २. संक्षेपशारीरककार—शुद्धब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है । ३. विवरणकार—माया शबलित सगुण ब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है । ४. तत्त्वनिर्णयकार—ब्रह्म और माया दोनों जगत् का उपादान कारण है । ५. सिद्धान्तमुक्तावलीकार—मायाशक्ति जगत् का उपादान कारण है । ६. पञ्चदशीकार—माया तो शुद्ध सत्त्वमयी है किन्तु अविद्या रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान है । संक्षेपशारीरककार—यथा मृतिका की चिकनाहट घट के उत्पादन के प्रति द्वारकारण होती है उसी प्रकार शुद्धब्रह्म के उपादान होने में माया द्वारकारण है । वाचस्पतिमिश्र—जीवाश्रित माया से विषयीकृत ब्रह्म प्रपञ्चरूप से परिणत होता है अतः ब्रह्म ही उपादानकारण है । माया तो सहकारी कारण है । 'स्वशक्त्या वटवद ब्रह्मकारणं शङ्करोऽबवीत् । जीवभ्रान्तिर्निमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥ अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् । जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥ —अमलानन्द, 'कल्पतरु' । ब्रह्माद्वैत एवं ईश्वराद्वयवाद— त्रिकदर्शन का 'ईश्वराद्वयवाद'—त्रिक शासन पूर्णतः अद्वैतवादी है । इसके मत में एक परमेश्वर मात्र ही 'तत्त्व' है । 'अज्ञान' या 'माया' या 'जगत्' आत्मा का स्वातन्त्र्य-शक्ति की क्रीड़ा या स्वेच्छापरिगृहीत अपर रूप है । परमेश्वर एक नट के समान स्वेच्छावश नानात्मक भूमिकायें ग्रहण करके विश्व के रूप में प्रकट होते हैं । जगत् और उसकी उत्पत्ति 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का विजृंभणमात्र है । अद्वैतवादी 'ब्रह्मवाद' में विश्वोत्तीर्ण, सत्य, निर्मल, निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मकर्तृत्वहीन है किन्तु त्रिक नय के अद्वैतवादी ईश्वराद्वयवाद में परमेश्वर में स्वातन्त्र्य- शक्ति की नित्य विद्यमानता परमेश्वर में नित्य कर्तृत्वपरता का सूचक है । आत्मास्वरूप शिव सृष्टि, स्थिति, संहार, अनुग्रह एवं विलय इन सभी पञ्चकृत्यों का संपादक है । शाङ्कर मत का ब्रह्म निष्क्रिय होने के कारण इन व्यापारों का निष्पादक नहीं है । दोनों अद्वैतवादी दृष्टियों में यह एक प्रधान भेद है । परमेश्वर एवं विश्व के मध्य सम्बन्ध की दृष्टि से भी दोनों दृष्टियों में भेद है । अभिनवगुप्त इस सम्बन्ध को 'दर्पणबिम्बवत्' मानते हैं और यही त्रिक दृष्टि है किन्तु शाङ्कर अद्वैत में जगन्मिथ्यात्व स्वीकार किया गया है । अभिनवगुप्त कहते हैं यथा स्वच्छ दर्पण में ग्राम, नगर, वृक्षादिक पदार्थ प्रति-