भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

८४ स्पन्दकारिका वेद्यासंवेदनमात्रं न तु वेदकस्य वेदकत्वाभावः सुषुप्तादिवत्' ततो निःसृतस्य सा अवस्था स्मर्त्तव्यतां वेद्यत्वम् आपन्ना व्यापकस्य सद्भावम् अभिव्यञ्जयत्येव ।'१ कहा भी गया है— 'जाग्रदादिनापि भेदे प्रवर्तमाने न तस्य स्वरूपमाव्रियते ॥'२ परिणामवाद एवं विवर्तवाद— आचार्य क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में प्रश्न उठाते हैं कि— 'जाग्रदादिविभेदेऽपि' शब्दावली में कारिकाकार का ध्वन्य क्या है? १. 'परिणाम' या कि २. 'विवर्त'? १. परिणामवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने परिणामवाद का प्रतिपादन नहीं किया है अतः 'तावन्न परिणामोऽस्ति ।।' किरणागम में भी कहा गया है कि—'परिणामोऽचेतनस्य चेतनस्य न युज्यते' अर्थात् परिणाम तो केवल अचेतन का हो सकता है किसी चेतन का नहीं।३ यदि अवस्थाओं की यह अभिव्यक्ति थोड़ी भी चित् तत्त्व से भिन्न होती तो अपर भी पूर्ववर्ती के विकास पर वही हो जाएगा क्योंकि वह विकास है और ऐसी स्थिति में कोई भी प्रकाशित नहीं हो सकता । अतः परिणाम के लिए कोई स्थान नहीं है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं— 'अवस्था प्रपञ्चोऽपि यदि चिन्मात्रात्परिणामतया मनागपि अतिरिच्येत् चिद्रूपं वा तत्परिणतौ मनाग् अतिरिच्येत् तन्नकिञ्चिच्चकास्यादिति तावन्न परिणामोऽस्ति ॥'४ २. विवर्तवाद का खण्डन—भासमान यह विश्व एवं उसकी अवस्थायें असत्य नहीं है क्योंकि तब तो स्वयं ब्रह्म भी असत्य सिद्ध हो जाएगा क्योंकि विश्व भगवान् का रूप ही तो है 'न च भासमानोऽसौ असत्यो ब्रह्मतत्त्वस्य अपि तथात्वापत्तेः— इत्यसत्यविभक्तान्यरूपोपग्राहिता विवर्त इत्यपि न संगतम् ।' फिर कारिकाकार का ध्वनित क्या है? वस्तुतः कारिकाकार 'विभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का प्रयोग करके 'भगवान् के अति दुर्घटकारित्व' को प्रकाशित करना चाहता है—'अनेन चातिदुर्धटकारित्वमेव भगवतो ध्वनितम् ॥'५ आचार्य क्षेमराज यह भी व्याख्या करते हैं कि कारिकाकार ने 'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का जो प्रयोग किया है और उसके द्वारा विभेद होते हुए भी स्वाभेद प्रदर्शित करना और इस प्रकार भेदाभेदोभय की अभिव्यक्ति करना (१) पर (२) अपर एवं (३) परापर—इस शक्तित्रय से युक्त भगवान् का ही जगत् के रूप में स्फुरित होना प्रमाणित करता है । 'विवर्त' मिथ्यावाद का पोषक है । किन्तु सत्य तो यह है कि जाग्रदादि अवस्थाओं में अवस्थित होने पर भी यह संवित् तत्त्व स्वस्वभाव का परिशीलन करता हुआ कोई अन्य नहीं है प्रत्युत मात्र शङ्कर ही है । अतः विवर्त का तो प्रश्न ही नहीं उठता ॥६ 'अभिन्ने' पद, परमात्मा द्वारा असंभव वस्तुओं को भी उत्पन्न करने की क्षमता का १-६. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' ।